Tuesday, September 8, 2015

कॉल ड्रॉप के फायदे ( व्यंग्य)

क्या आप कॉल ड्रॉप की समस्या से परेशान हैं? क्या आप कॉल ड्रॉप की वजह से झुंझलाए रहते हैं? क्या आपको लगता है कि कॉल ड्रॉप की वजह से आपकी ज़िंदगी नरक हो गई है? यदि हां, तो यह व्यंग्य आपके लिए है,क्योंकि समस्या पीड़ितों के लिए यह व्यंग्य नहीं गंभीर आलेख है। या कहें ऐसा बंगाली दवाखाना है, जो खुद आपके पास चलकर आया है। दरअसल, कॉल ड्रॉप यानी मोबाइल पर बात करते करते कट जाने की समस्या उतनी बुरी नहीं जितनी आपको लग रही है। सच तो यह है कि कंपनियां कॉल ड्रॉप कर करके ग्राहकों को सुविधा दे रही हैं। कॉल ड्रॉप के रुप में ग्राहकों को ऐसी रहमत मिली है, जिसके लाभ के बारे में वे सोच ही नहीं रहे। मसलन सुबह आपका बॉस फोन करता है तो आप क्या करते हैं? आप फोन उठाते हैं और सबसे पहले सुबह उस शख्स की आवाज़ सुनते हैं, जिसकी आवाज़ आप सिवाय उस दिन के नहीं सुनना चाहते, जब वो आपको बुलाकर इंक्रीमेंट लैटर देता है। लेकिन सुबह सुबह आपको वो फटी आवाज़ सुननी पड़ती है क्योंकि फोन उठाना आपकी मजबूरी है। जबकि फोन कब रखा जाएगा, यह तय करना बॉस का अधिकार। बॉस किसी भी बात के लिए आपको फोन करता है। मसलन-कई बॉस पहले एसएमएस करेंगे और फिर फोन करेंगे कहेंगे-"यार एक एसएमएस किया है, देख लेना।" अरे ! जब फोन ही करना तो एसएमएस क्यों किया। लेकिन, कॉल ड्रॉप की समस्या ने झटके में सर्वहारा वर्ग को साम्राज्यवादी शक्तियों के बराबर ला खड़ा किया है। अगर आपको बॉस की आवाज़ पसंद नहीं आ रही तो आप हैलो हैलो करते हुए फोन काट सकते हैं और इसका ठीकरा कॉल ड्रॉप पर फोड़ सकते हैं। चूंकि यह समस्या सर्वविद्यमान है तो आप की नीयत पर शक करना बॉस के लिए आसान नहीं होगा। बॉस की छोड़िए, कॉल ड्रॉप की सुविधा का लाभ उन अनंत आशिकों को भी मिल सकता है, जिनके पास ऐसी गर्लफ्रेंड हैं, जो फेविकोल की ब्रांड एम्बेसेडर हुए बिना उसका प्रचार कर रही हैं। मसलन-कई गर्लफ्रेंड फोन पर एक ही सवाल इतनी बार पूछती हैं कि बंदा लगभग मूर्छित होने की स्थिति में आ जाता है। कई सगाई धारक और विवाह को प्रतीक्षारत भावी दुल्हे अपनी मंगेतर के सवालों से इतना परेशान हो जाते हैं कि अगर आलस्य का गुण उनमें कूट कूटकर न भरा हो तो वे रजाई से निकलकर अपना सिर कहीं पटक आएं। आलस्य नामक गुण मंगेतर के कई सवालों को एक हजार बार सुनने के बावजूद उन्हें आत्महत्या की कोशिश से बचाए रखता है। मसलन-शादी से छह महीने पहले ही मंगेतर पूछने लगती है- हम शादी के बाद कहां रहेंगे। तुम्हारी मम्मी हमारे साथ रहेंगी या देवर जी के साथ। मैं पहले ही बता रही हूं कि मुझे खाना बनाना नहीं आता। हम हनीमून पर मॉरीशस जा रहे हैं न। तुमने स्विटजरलैंड की टिकट बुक करा ली न ! वगैरह वगैरह। मंगेतर के ऐसे सवालों के विकट दौर में कॉल ड्रॉप की समस्या वरदान साबित हो सकती है। कॉल ड्रॉप का सबसे बड़ा फायदा है कि बेईमान और अनैतिक होते हुए भी आप नैतिक और ईमानदार बने रह सकते हैं। कलयुग में यह कॉम्बो ऑफर किस्मतवालों को ही मिलता है। या कहिए कि जिस तरह दिखते सभी को हैं लेकिन प्लेन के सस्ते टिकट हर ग्राहक को नहीं मिल पाते उसी तरह अनैतिक होते हुए नैतिक दिखने का वरदान सबको नहीं मिलता। तो अब आप समझ गए होंगे कि कॉल ड्रॉप कोई समस्या नहीं बल्कि टेलीकॉम कंपनियों द्वारा ग्राहक को दी जा रही एक अदृश्य सुविधआ है। आप भी कॉल ड्रॉप सुविधा का लाभ उठाइए और जीवन का भरपूर आनंद लीजिए।

Tuesday, August 4, 2015

अश्लील साइट्स के मुद्दे पर बहस जरुरी

केंद्र सरकार के बीते शुक्रवार को करीब 857 पोर्न साइट्स पर पाबंदी का आदेश सार्वजनिक हुआ तो हंगामा मच गया। सोशल मीडिया पर सरकार के इस कदम की जमकर मुखालफत भी हुई। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में 2013 में दाखिल एक जनहित याचिका के संबंध में कार्यवाही करते हुए यह फैसला किया है। 'नैतिकता' और 'शालीनता' का हवाला देते हुए सरकार ने यह भी कहा कि यह प्रतिबंध उन साइट्स के खिलाफ है, जिन पर बच्चों से संबंधित अश्लील सामग्री उपलब्ध थी। सरकार के इस फैसले और उस पर मचे हंगामे ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मसलन क्या सरकार के फैसले का एक सिरा अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ता है? क्योंकि 8 जुलाई को ही सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट पर अश्लील साइट्स को ब्लॉक करने संबंधी मामले में सुनवाई करते हुए कहा था कि पोर्न साइट पर प्रतिबंध निजता और व्यक्तिगत आजादी के खिलाफ होगा। प्रधान न्यायाधीश एचएल दत्तू ने कहा "अगर कोई मेरी कोर्ट में आता है और कहता है कि मैं एक वयस्क हूं और आप कैसे इस बात का फैसला करेंगे कि मैं वयस्क फिल्म देखूं या नहीं। व्यक्तिगत आजादी के मौलिक अधिकार की वजह से इस पर पाबंदी नहीं लगायी जा सकती है।" हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि ये एक गंभीर मसला है। सवाल ये भी है कि क्या चंद साइट्स को ब्लॉक करने से क्या इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी रुक सकती है? क्योंकि प्रॉक्सी सर्वर के जरिए आसानी से अश्लीस साइट्स तक पहुंचा जा सकता है और आज के तकनीकी युग में प्रॉक्सी सर्वर के बारे में नयी पीढी जानती है और जो लोग नहीं जानते वे आसानी से इंटरनेट के जरिए जान सकते हैं। इसके अलावा, जब मोबाइल फोन के जरिए आसानी से पोर्न कंटेंट इधर-उधर किया जाना संभव है तो इंटरनेट पर अश्लील साइट्स पर पाबंदी का मतलब क्या है? इतना ही नहीं, भारत में अश्लील साइट्स नहीं देखने को लेकर कोई कानून नहीं है, जिसका सहारा लेकर सरकार पूरी तरह इन वेबसाइट्स पर पाबंदी लगा सके, और इसीलिए नैतिकता और शालीनता जैसे तर्कों के आसरे पाबंदी को अमली जामा पहनाया गया। पोर्नोग्राफी के विषय में एक कहावत भी है-‘पोर्नोग्राफी इज द बीस्ट, विच थ्राइव ऑन द रिप्रेशन'। यानी पॉर्नोग्राफी ऐसा राक्षस है, जिसे जितना ज्यादा दबाया जाएगा, वह उतना ही ज्यादा ताकतवर बन जाएगा। इसलिए इंटरनेट पर अश्लील साइटों के खिलाफ पाबंदी का एक पहलू ये भी है कि साइट्स पर जितनी पाबंदी लगाई जाएगी, उतनी ही संख्या में नयी वेबसाइट्स शुरु होंगी। लेकिन इसके विपरित एक सवाल यह भी है कि क्या पोर्न साइट्स पर पाबंदी जरुरी नहीं है? क्योंकि जिस तरह इंटरनेट के रथ पर सवार होकर अश्लील कंटेंट नैतिक प्रदूषण फैला रहा है। खासकर बच्चों के दिमाग को प्रभावित कर रहा है और बच्चों से संबंधित पोर्नोग्राफी के बाजार को बढ़ावा दे रहा है, उसके अपने खतरे तो हैं ही। दरअसल, अश्लील साइट्स पर पाबंदी के फैसले में कई पेंच है, जिससे इसका सकारात्मक पक्ष दब जाता है, जबकि नकारात्मक पक्ष उजागर होता है। अच्छी बात यह है कि सरकार के इस फैसले के बाद पोर्न कंटेंट को लेकर समाज में दबी बहस फिर सतह पर आ गई, क्योंकि अश्लील वेबसाइट्स के हिमायती लोगों की बड़ी संख्या है और जो बात अभी तक आंकड़ों के इर्दगिर्द कही जाती थी, अब उसे चेहरे मिल रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि समाज में वयस्कों को अश्लील सामग्री पढ़ने-देखने से रोकने का कोई आधार नहीं है। अश्लील साइट्स का अपना बाजार है, जो लगातार तेजी से बढ़ भी रहा है। पॉर्नहब नाम की एक कंपनी ने 2014 में भारत में पोर्नोग्राफी के ट्रेंड पर सर्वे करवाया था और इंटरनेट पोर्नोग्राफी के लिहाज़ से भारत दुनिया में पांचवें स्थान पर पाया गया था। इस सर्वे के मुताबिक भारत के 50 फ़ीसदी लोग अपने स्मार्टफ़ोन से ऑनलाइन पोर्नोग्राफी वेबसाइट पर जाते हैं। पॉर्न साइट देखने वाला औसत भारतीय सात पेज से ज़्यादा देखता है जो कि दुनिया के औसत से तीन गुना अधिक है। और सर्वे में ये भी पता चला कि मिजोरम, दिल्ली, मेघालय और महाराष्ट्र में पोर्नोग्राफी देखने वालों का सबसे बड़ा बाज़ार है। अमेरिकी वेबसाइट 'द डेली बीस्ट' के पोर्नहब के साथ मिलकर किए अध्ययन के मुताबिक भारत में पोर्न देखने के मामले में अब भारतीय महिलाएं भी बहुत तेजी से आगे निकल रही हैं। नए आंकड़ों के मुताबिक ऑनलाइन पोर्न देखने वाली महिलाओं की कुल संख्या में भारतीय महिलाओं की संख्या 26 फीसदी से बढ़कर 30 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई है। पिछले वर्ष यह आंकड़ा 26 फीसदी था। भारत में डिजिटल पोर्नोग्राफी का बाजार 500 करोड़ से ज्यादा का है। लेकिन मुद्दा इंटरनेट-मोबाइल पर उपलब्ध अश्लील सामग्री से बच्चों के जुड़ाव का है और इस बहस में इस मुद्दे पर ही ज्यादा चर्चा नहीं हो रही। मैक्केफी के कुछ महीने पहले किए एक सर्वे के मुताबिक दिल्ली के किशोरों में 53 फीसदी ऑनलाइन पोर्न सामग्री देखते हैं, जबकि 29 फीसदी दिन में कई बार अश्लील सामग्री देखते हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील सामग्री तक बच्चों की सहज पहुंच की चिंताजनक है। इस बाबत अब बात होनी चाहिए। दुनिया के कई देशों में बच्चों के लिए इंटरनेट को सुरक्षित बनाने की दिशा में काम हो रहा है।चीन में ‘क्लीनिंग द वेब-2014’ अभियान के तहत 5०० से ज्यादा अश्लील वेबसाइटों को बंद कर दिया गया था। जर्मनी में ऐसी साइटों को रोकने के लिए ‘किंडर सर्वर’ शुरू किया गया। लेकिन भारत में ऐसी कोई कोशिश फिलहाल नहीं हुई। यह अजीबोगरीब है कि सड़क पर गाड़ी चलाने के लिए हमें ड्राइविंग लाइसेंस लेने की आवश्यकता होती है। लेकिन इंटरनेट के सुपर हाइवे पर गाड़ी दौड़ाने के लिए किसी को किसी तरह के लाइसेंस अथवा ट्रेनिंग की कोई आवश्यकता नहीं। इंटरनेट के इस्तेमाल के बाबत लगातार हो रहे सर्वे बता रहे हैं कि घरों में बच्चे इंटरनेट किस तरह इस्तेमाल कर रहे हैं-इसका मां-बाप को अमूमन पता नहीं होता। इंटरनेट कनेक्शन देते वक्त इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर किसी तरह का कोई क्रैश कोर्स नहीं करातीं या जानकारी देतीं कि इंटरनेट पर क्या क्या सावधानियां बरती जाएं ताकि बच्चों के हाथों में सुरक्षित कंटेंट पहुंचे। अश्लील साइट्स पर पाबंदी के बीच सरकार की तरफ से एक बयान यह भी आया है कि यह पाबंदी अस्थायी है लेकिन सच यही है कि इंटरनेट पर पोर्न कंटेंट को तकनीकी रुप से रोकना लगभग असंभव है। एक विकसित समाज में कौन क्या देखेगा-यह तय करना सरकार का काम नहीं है। यह लोगों को खुद तय करना होगा। लेकिन इंटरनेट के जरिए बहती अश्लीलता बच्चों के कोमल मन को प्रदूषित न करे-इसकी जिम्मेदारी किसकी है?

Thursday, July 2, 2015

सवाल नेहरु का नहीं, हमारा है

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के विकीपीडिया प्रोफाइल को 27 जून को किसी ने बदल दिया और उन्हें मुस्लिम बता दिया। उनके पिता मोतीलाल नेहरु और उनके दादा के प्रोफाइल पेज पर भी इसी तरह छेड़खानी की गई। इतना ही नहीं, नेहरु के बारे में कुछ अन्य आपत्तिजनक बातें भी प्रोफाइल में जोड़ी गईं। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि जिस आईपी एड्रेस से यह छेड़खानी की गई, वो केंद्र सरकार को सॉफ्टवेयर देने वाली संस्था नेशनल इंफोरमेटिक्स सेंटर के दफ्तर का है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नेशनल इंफोरमेटिक्स सेंटर ने अब इस बाबत आंतरिक जांच शुरु कर दी है कि किसने यह छेड़खानी की। दुनिया के सबसे बड़े ऑनलाइन संदर्भकोश विकीपीडिया पर नेहरु के प्रोफाइल से छेड़छाड़ कोई पहला मामला नहीं है, लेकिन इस मामले में एनआईसी का नाम आन के बाद विवाद न केवल अहम हो गया है बल्कि कई सवालों के जवाब की मांग करता है। सबसे बड़ा सवाल यही कि क्या सरकार विरोधी दलों के बड़े नेताओं की वर्चुअल पहचान को धूमिल करने की कोशिश कर रही है? दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियां अपने ब्रांड या प्रोडक्ट का विकीपीडिया पेज लगातार न केवल अपडेट करती हैं बल्कि उनमें उत्पाद की खूबियां बढ़ा चढ़ाकर पेश करनी की कोशिश करती हैं। इसके लिए पेशेवर लोगों की मदद ली जाती है। इंटरनेट पर सूचना प्राप्ति का विकीपीडिया प्राथमिक और महत्वूर्ण स्रोतों में एक है तो इस चलन को कंपनियों से आगे बढ़कर कुछ सरकारों ने भी अपनाया और बड़ी शख्सियतों ने भी। बावजूद इसके सच यही है कि विकीपीडिया 'ओपन सोर्स' है, और इसमें संपादन (कुछ मामलों को छोड़कर) कोई भी कर सकता है। विकीपीडिया के बारे में कई भ्रांतियां है। सबसे पहली तो यही कि कई लोग इसे प्रामाणिक संदर्भकोश की तरह देखते हैं। जबकि विकीपीडिया में गलतियों की भरमार है। कुछ साल पहले अमेरिका के पेन स्टेट विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर मारिका डब्लू डिसटासो ने अपने अध्ययन में पाया था कि विकीपीडिया पर मौजूद हर दस में से छह लेखों में अशुद्धियां हैं। अध्ययन के दौरान किए एक सर्वे के मुताबिक जब विकीपीडिया के टॉक पेज के जरिए अशुद्धियां दुरुस्त करने की कोशिश हुई तो नतीजा बहुत उत्साहजनक नहीं रहा। 40 फीसदी लोगों को विकीपीडिया के संपादकों की तरफ से प्रतिक्रिया मिलने में एक दिन से ज्यादा का समय लगा, जबकि 12 फीसदी को एक हफ्ते से ज्यादा का वक्त लगा। खास बात यह कि 25 फीसदी शिकायतों के संदर्भ में तो कोई प्रतिक्रिया ही नहीं मिली। इस अध्ययन के मुताबिक 60 फीसदी कंपनियों के पेजों पर उनके अथवा उनसे जुड़े ग्राहकों के बारे में तथ्यात्मक रुप से गलत जानकारी है। गौरतलब है कि विकीपीडिया ने करीब तीन साल पहले स्वयं अपने अपने संदर्भ कोष के बारे में कराए एक अध्ययन में पाया था कि 13 फ़ीसदी लेखों में ग़लतियाँ हैं। साल 2012 में विकिपीडिया की विश्वसनीयता को बड़ा सवाल उस वक्त खड़ा हो गया था, जब एक काल्पनिक युद्ध से संबंधित लेख को पाँच साल बाद साइट से हटाने की बात सार्वजनिक हुई। यह लेख ‘बिकोलिम संघर्ष’ नाम के एक काल्पनिक युद्ध के बारे में था। इसमें 17वी शताब्दी में पुर्तगालियों और मराठा साम्राज्य के बीच काल्पनिक युद्ध का जिक्र था। बाद में वेबसाइट को जानकारी मिली कि ऐसा युद्ध कभी हुआ ही नहीं और लेख में शामिल जानकारियां और संदर्भ पूरी तरह काल्पनिक हैं। यह लेख जुलाई 2007 में विकिपीडिया पर डाला गया था और सिर्फ दो महीने बाद वेबसाइट के संपादकों ने इसे अच्छे लेखों की श्रेणी में डाल दिया था। उल्लेखनीय है कि विकिपीडिया पर उपलब्ध अंग्रेजी के कुल लेखों में सिर्फ एक फीसदी लेखों को इस श्रेणी में रखा गया है। विकीपीडिया पर सामग्री से छेड़छाड़ का एक मामला 2011 जुलाई में मुंबई बम धमाकों के वक्त सामने आया था, जब अजमल कसाब के जन्म तारीख को एक दिन में ही 8 से ज्यादा बार बदला गया। विकीपीडिया की विश्वसनीयता 100 फीसदी कभी नहीं रही। हां ये तमाम विषयों पर जानकारी का प्रथम स्रोत अवश्य है। दिक्कत यही है कि विकीपीडिया प्रथम स्रोत के बजाय मुख्य स्रोत की जगह लेता जा रहा है। इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि 244 साल पहले शुरु हुए सबसे प्रामाणिक संदर्भकोश ब्रिटेनिका को भी अपना प्रिंट संस्करण बंद करना पड़ा है। इसमें भी ध्यान रखने वाली बात यह है कि विकीपीडिया के पेजों को विकीपीडिया के स्वयंसेवक अपडेट करते हैं। अंग्रेजी विकीपीडिया के स्वयंसेवकों की संख्या लाखों में है, इसलिए अंग्रेजी विकीपीडिया तेजी से अपडेट होता है, जबकि हिन्दी समेत तमाम क्षेत्रीय भाषाओं के पेजों में सैकड़ों त्रुटियां कई-कई दिनों तक सुधारी नहीं जातीं। दिक्कत यह है कि अकादमिक, पत्रकारीय और अन्य महत्वपूर्ण मंचों पर भी विकीपीडिया से ली सामग्री बिना 'क्रॉस चैक' के इस्तेमाल की जा रही है। लेकिन अब सवाल विकीपीडिया की विश्वसनीयता भर का भी नहीं है। सवाल है वर्चुअल दुनिया में अपनी पहचान के विषय में पता होने और उसे बचाने का। क्या हमने कभी देखा है कि वर्चुअल दुनिया में हमारी पहचान कैसी है? बहुत मुमकिन है कि किसी अंजान ब्लॉग पर आपके बारे में ऐसी भ्रामक और गलत बातें लिखी हों-जिनके बारे में आपको पता ही नहीं हो और सर्च इंजन में आपके बारे में खोजने पर वही पेज सबसे पहले आता हो। हो सकता है कि आपके नाम से कोई टि्वटर या फेसबुक खाता संचालित हो रहा है, जिस पर आपने कभी ध्यान ही नहीं दिया हो। विकीपीडिया पर जवाहरलाल नेहरु के पेज से छेड़छाड़ ने फिर इस मुद्दे को प्रमुखता से उठा दिया है। क्योंकि सवाल सिर्फ जवाहरलाल नेहरु, महात्मा गांधी या किसी बड़े राजनेता का नहीं, हमारा भी है। सवाल हमारी 'वर्चुअल आइडेंटिटी' का भी है। नए डिजिटल समाज में हर सामाजिक व्यक्ति की वर्चुअल दुनिया में भी एक पहचान है, और यह जिम्मेदारी उसे खुद उठानी होगी कि उसकी आभासी पहचान सही सलामत और प्रामाणिक रहे। यह बड़ी चुनौती है कि क्योंकि अभी भी देश में डिजिटल साक्षरता बहुत अधिक नहीं है, और लोग वर्चुअल पहचान को लेकर ज्यादा सजग नहीं है। सच यही है कि इंटरनेट के विस्तार के साथ इस नई समस्या के बड़े खतरों से रुबरु होना हमें अभी बाकी है। (लेखक सोशल मीडिया जानकार है)

Thursday, June 4, 2015

कम नंबर लाने के भी फायदे हैं ! (व्यंग्य)

सीबीएसई बोर्ड के दसवीं-बारहवीं के नतीजे आ गए हैं। कुछ बच्चों को 100 फीसदी नंबर मिले हैं। 97-98-99 फीसदी नंबर लाने वाले तो कई हैं। ऐसा लग रहा है कि मानो नंबरों की लूट मची और बच्चों ने पैन की नोंक पर सब लूट डाले। इत्ते नंबर मिले हैं कि कई बार शक होता है कि जांचने वाले अध्यापक ने वास्तव में ठीक तरह से जांच की भी या नहीं ? एमपी बोर्ड और यूपी बोर्ड से दसवीं-बारहवीं कर चुके लोग तो नंबरों के इस खेल की जांच की मांग कर सकते हैं। यूपी-एमपी बोर्ड में दसवीं-बारहवीं में मिलाकर जितने अंक नहीं आते थे, सीबीएसई में एक बार में ही आ जाते हैं। ऐसे में नंबरों के घोटाले की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। इस देश में आज तक किसी घोटाले की जांच कायदे से निष्कर्ष पर नहीं पहुंची, लिहाजा नंबरों के घोटाले की जांच का निष्कर्ष तक पहुंचना असंभव है। लेकिन सवाल नंबरों का नहीं, उन बच्चों का है, जिनके नंबर नहीं आए। वे उदास हैं। इस कदर उदास हैं कि कुछ पटरी तक हो आए और ट्रेन को दो मिनट विलंब से आता देख अपने खुदकुशी के कार्यक्रम को स्थगित कर लौट आए। कुछ ने घर से भागने का प्रोग्राम इसलिए स्थगित कर रखा है कि बाहर गर्मी बहुत है। उन्हें सिर्फ अच्छे मौसम का इंतज़ार है। इस देश में नंबरों का बड़ा महत्व है। बैंक एकाउंट से लेकर संसद तक अंकों के आसरे सफलता का आँका जा रहा है। लेकिन बोर्ड के इम्तिहान में कम नंबर वाले इस चक्कर में न फंसें। कम नंबर का अपना महत्व है। उसके अपने लाभ हैं और उस फायदे को समझें। इससे बड़ी किरपा आएगी। कम नंबर का आर्थिक लाभ यह है कि आपको पार्टी नहीं देनी पड़ेगी। आपके मां-बाप को भी नहीं। आप सिर्फ पार्टी उड़ाएंगे, देंगे नहीं। यानी महंगाई के इस दौर में जबरदस्त बचत। कम नंबर का दूसरा लाभ यह है कि आप यह बता सकते हैं कि आप जिस बात को शिद्दत से महसूस करते हैं, उसी राह पर चलते हैं। और आप इस बात को शिद्दत से महसूस कीजिए कि अंकों का कोई मतलब नहीं है। कम नंबरों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे आप पर कोई दबाव नहीं रहता। घर के सारे सदस्य समझ जाते हैं कि आप निठल्ले हैं या आपसे कुछ नहीं होगा। और जब तक दबाव नहीं होता तो इंसान मस्ती की धुन में रहता है। इसके अलावा जब दबाव न हो और फिर बंदा छक्के जड़ दे तो झटके में खिलाड़ी महान हो जाता है।

Tuesday, July 2, 2013

सवाल स्नोडेन से आगे का

अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के पूर्व कर्मचारी एडवर्ड स्नोडेन के खुलासों से तिलमिलाए अमेरिका की मुसीबत कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। एक तरफ, स्नोडेन अमेरिका की गिरफ्त से लगातार बाहर बना हुआ है, तो दूसरी तरफ स्नोडेन द्वारा लीक जानकारियों से नए नए राज़ सामने आ रहे हैं। जर्मनी की पत्रिका डेयर स्पिगल के मुताबिक स्नोडेन के दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि अमेरिका ने वाशिंगटन, न्यूयॉर्क और ब्रूसेल्स में ईयू के दफ्तरों पर इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और कंप्यूटर नेटवर्क हैक किए। इस खुलासे से नाराज यूरोपियन यूनियन ने अमेरिका से सफाई माँगी है। द गार्जियन ने इस खुलासे को नया आयाम दे दिया है। गार्जियन के मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के जासूसी के लिए लक्ष्य 38 ठिकानों में भारतीय दूतावास भी शामिल था। अमेरिकी सरकार इन आरोपों पर अब चुप्पी साधे है। अमेरिका के लिए बड़ी परेशानी स्नोडेन को वापस देश लाना है, जिस पर जासूसी, सरकारी डाटा चुराने और अनाधिकृत लोगों तक खुफिया सूचना पहुंचाने का आरोप है। बीती 13 मई को अमेरिकी जासूसी के बाबत खुलासों के साथ स्नोडेन हॉगकांग पहुंच गया था, जहां से वह रूस पहुंच गया। स्नोडेन अब इक्वाडोर में राजनीतिक शरण चाहता है। एडवर्ड स्नोडेन का प्रत्यर्पण अब एक कूटनीतिक मसला बन गया है। अमेरिका की हांगकांग से प्रत्यपर्ण संधि होने के बावजूद स्नोडेन वहां से रूस जाने में कामयाब हुआ, जिसे लेकर अमेरिका खफा है। लेकिन, इसे हॉंगकॉंग पर चीन के प्रभाव के नतीजे के रुप में देखा जा रहा है, जो अमेरिकी जासूसी की कारगुजारी के खुलासे को अपनी कूटनीतिक बढ़त रुप में देख रहा है। अमेरिका द्वारा दुनिया भर के देशों में साइबर जासूसी को अंजाम देने के खुलासे के बाद चीन को पलटवार का मौका मिल गया है, जिसे साइबर जासूसी के लिए कुख्यात माना जाता है। एडवर्ड स्नोडेन 23 जून से कथित तौर पर रूस में हैं, लेकिन रूस अमेरिकी दादागिरी के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने वाली ताकत की प्रतिष्ठा के साए में स्नोडेन रूपी हड्डी को न सहजता से उगल सकता है, न निगल सकता है। स्नोडेन की कहानी को रोज़ पुष्ट-अपुष्ट सूचनाएं और बयान नया रंग दे रहे हैं। फिलहाल, स्नोडेन मसले पर गेंद रूस और इक्वाडोर के पाले में है, क्योंकि उन्हें अब फैसला लेना है। इक्वाडोर के राष्ट्रपति राफेल कोर्रिया कह चुके हैं कि राजनीतिक शरण के लिए आवेदन देने की प्रक्रिया इक्वाडोर के इलाके में रहकर ही की जा सकती है, जो अभी तक नहीं की गई है। निश्चित रुप से एडवर्ड स्नोडेन एक कूटनीतिक मसला बन गए हैं और उनके संदिग्ध भविष्य पर क्या फैसला होता है, ये देखना दिलचस्प होगा। लेकिन, सवाल स्नोडेन के प्रत्यर्पण से आगे का है। सवाल अमेरिका के उस जासूसी कार्यक्रम का है, जिस पर बहस स्नोडेन के साये में दब गई है? गौरतलब है कि ब्रिटिश अखबार गार्जियन को दिए एक साक्षात्कार में स्नोडेन ने अमरीका के दो कार्यक्रमों के बारे में बताया था। एक कार्यक्रम के जरिए एनएसए लाखों करोड़ों फोन कॉल के ब्यौरे जमा करता है। एनएसए इसके जरिए यह जानने की इच्छा रखता है कि संदिग्ध आतंकवादी अमेरिका में किन लोगों के संपर्क में हैं। दूसरा कार्यक्रम प्रिज्म था, जिसमें नौ बड़ी इंटरनेट कंपनियों के सर्वरों पर खुफिया एजेंसी की सीधी पहुंच थी। प्रिज्म के जरिए अमेरिका विदेशों में बैठे इंटरनेट उपयोक्ताओं तक नजर रखे हुए था। इस खुलासे के बाद दुनिया के कई मुल्क साइबर दुनिया में अपनी निजता को लेकर आशंकित और चिंतित हैं। लेकिन, स्नोडेन के मसले पर वह गंभीर बहस सिरे से नदारद दिख रही है। ऐसा नहीं है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी और संघीय जाँच एजेंसी ने साइबर दुनिया में जासूसी का काम अभी शुरु किया है, लेकिन अति गोपनीय ‘प्रिज्म’ के बाबत खुलासे ने साफ कर दिया कि साइबर दुनिया की नौ बड़ी कंपनियां बाकायदा जाँच एजेंसियों की साझेदार हैं। ब्रिटिश समाचार पत्र ‘गार्जियन और अमेरिकी समाचार पत्र ‘वाशिंगटन पोस्ट’ ने स्नोडेन से प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर इस सनसनीखेज खुलासे को सार्वजनिक किया था। प्रिज़्म की शुरुआत पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के वारंटमुक्त घरेलू निगरानी कार्यक्रम की राख से हुआ, जिसे 2007 में मीडिया ने सार्वजनिक कर दिया था। इसके बाद 2007 के प्रोटेक्ट अमेरिका एक्ट और फीसा (फॉरेन एंटेलीजेंस सरविलेंस एक्ट) अमेंडमेंट एक्ट 2008 के साए में प्रिज़्म का जन्म हुआ। गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक बिल गेट्स की माइक्रोसॉफ्ट सबसे पहले 11 सितंबर 2007 को इस कार्यक्रम का हिस्सा बनी। इसके बाद याहू, गूगल, फेसबुक आदि। सबसे आखिर में यानी अक्टूबर 2012 में एपल इस कार्यक्रम में शामिल हुई। रिपोर्ट के मुताबिक प्रिज्म के तहत एनएसए माइक्रोसॉफ्ट, याहू, गूगल, फेसबुक, पालटॉक, एओएल,स्काइप,यूट्यूब और एपल के सर्वरों से सीधे सूचनाएं हासिल कर रही है। इस कार्यक्रम पर अमेरिकी सरकार बीस लाख डॉलर से ज्यादा सालाना खर्च कर रही है। गार्जियन ने यह भी खुलासा किया था कि ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी जीसीएचक्यू भी अमेरिकी ऑपरेशन का हिस्सा है। अमेरिका ने आतंकवादी गतिविधियों पर रोक के लिए प्रिज्म को आवश्यक बताया है। हाल में भारत दौर पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने इस कार्यक्रम को आवश्यक करार दिया था। लेकिन, सवाल है कि क्या निजता के अधिकार का कोई मतलब है या नहीं। प्रिज्म के खुलासे के बाद साख का संकट अमेरिका सरकार के साथ इंटरनेट कंपनियों के सामने भी है। दिलचस्प है कि ‘विकिलिक्स’ के संस्थापक जूलियन असांजे ने रशियन टुडे को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि फेसबुकअमेरिकी खुफिया एजेंसियों के लिए दुनिया की सबसे बेहतरीन जासूसी मशीन है। असांजे ने कहा था, “सिर्फ फेसबुक ही नहीं, बल्कि गूगल और याहू जैसी तमाम बड़ी कंपनियों ने अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के लिए ‘बिल्ट-इन इंटरफेस’ निर्मित कर दिए हैं।” साल 2011 में अमेरिकी कंज्यूमर वाचडॉग ने लॉस्ट इन द क्लाउड : गूगल एंड द यूएस गवर्नमेंट नाम से एक रिपोर्ट जारी कर कहा था कि गूगल एनएसए के साथ “अनुचित खुफिया रिश्ते” निभा रहा है और इसका लाभ उसे मिल रहा है। फिलहाल, प्रिज्म के बाबत खुलासे के कुछ निहितार्थ अवश्य हैं। पहला, अमेरिका को अब कई मुल्कों को इस बाबत जवाब देना पड़ेगा और अपनी कूटनीतिक चतुराई को स्पष्ट करना होगा। चीन साइबर जासूसी के मसले पर अब अमेरिकी आरोपों को आसानी से नहीं सुनेगा। सिलिकॉन घाटी की कई इंटरनेट कंपनियां अब दूसरा ठिकाना खोज सकती हैं, जो इस आशंका से भयभीत हैं कि उनका व्यवसाय इस बात से प्रभावित हो सकता है कि वे सरकार के निकट हैं। प्रिज्म कार्यक्रम कुछ दिनों के लिए प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा फेसबुक और गूगल जैसी कंपनियों के क्षेत्रीय स्तर पर कुछ विकल्प उभर सकते हैं। इंटरनेट पर बहुत हद तक अभी भी अमेरिकी नियंत्रण है और अधिकांश बड़ी इंटरनेट कंपनियां अमेरिकी हैं। वे मूलत: वहां के कानूनों से संचालित होती हैं,लिहाजा सवाल भारत व अन्य देशों का है कि वे साइबर दुनिया में अपनी निजता को कैसे बचाते हैं। चिंतानजक बात यही है कि हमने भी बिना गंभीर विचार-विमर्श अमेरिका के साइबर जासूसी कार्यक्रम को समर्थन दे डाला है।

Monday, May 27, 2013

आठ साल की ‘यूट्यूब’ के बीच

वीडियो शेयरिंग साइट यूट्यूब ने बीते सोमवार को आठ साल पूरे कर लिए। आठ साल पहले महज एक वीडियो से शुरु हुई इस साइट पर आज प्रति मिनट 100 घंटे का वीडियो अपलोड हो रहा है। कॉमस्कोर की रिपोर्ट के मुताबिक यूट्यूब पर साल 2011 में हर मिनट करीब 48 घंटे का वीडियो अपलोड हो रहा था, जबकि साल 2007 में यह आंकड़ा महज 8 घंटे का था। यूट्यूब का दावा है कि हर महीने एक अरब लोग इस साइट पर वीडियो देखते हैं। लेकिन, सवाल आंकड़े का नहीं उपयोगिता का है। क्या यूट्यूब की उपयोगिता के विस्तार लेते संसार में आम लोग वास्तव में पूरा लाभ उठा पा रहे हैं ? बीते आठ साल में यूट्यूब ने खुद को वीडियो शेयर करने वाली साइटों में लगातार नंबर एक बना कर रखा। इसकी बड़ी वजह गूगल के पास इसका मालिकाना हक होना है तो दूसरी प्रमुख वजह उपयोगिता का दायरा बढ़ना भी है। यूट्यूब पर कोई भी शख्स वीडियो अपलोड कर सकता है, लिहाजा आज यहां चार अरब से ज्यादा वीडियो उपलब्ध हैं। आप सिर्फ कल्पना कीजिए और वह वीडियो यूट्यूब पर मौजूद है। यूट्यूब पर शादी-मुंडन और होली-दीवाली जैसे त्योहारों की तस्वीरों से लेकर राजनेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस, फिल्में, पुराने मैच और तमाम हैरतअंगेज वीडियो उपलब्ध हैं। कई दिलचस्प प्रयोग यूट्यूब के जरिए परवान चढ़ रहे हैं। मसलन डब्लूडब्लूडब्लूखानएकैडमीडॉटऑर्ग नाम के वेब पते पर अपना खास स्कूल संचालित करने वाले अमेरिकी सलमान खान वर्चुअल दुनिया में ऐसा स्कूल चला रहे हैं, जहां करीब तीन लाख छात्र निशुल्क शिक्षा ले रहे हैं। कई देशी-विदेशी राजनेताओं और दूसरे सेलेब्रिटी के यूट्यूब चैनल हैं, जिन पर वो अपने वीडियो उपलब्ध कराते हैं। हॉलीवुड में यूट्यूब पर फिल्मों का प्रदर्शन शुरु हो चुका है। बॉलीवुड में भी ‘स्ट्राइकर’ समेत कुछ फिल्मों का प्रदर्शन भी यूट्यूब पर हुआ है। दो साल पहले विवाद में फँसे इंडियन प्रीमियर लीग के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी ने खुद पर लगे आरोपों का जवाब देते हुए अपना इंटरव्यू सबसे पहले यूट्यूब पर अपलोड किया था। यूट्यूब पर आईपीएल मैचों के लाइव प्रसारण हो ही चुका है। नागरिक पत्रकारों को तो यूट्यूब ने नए पंख दिए ही हैं। यूट्यूब को 2005 में पेपाल नामक कंपनी के तीन पूर्व कर्मचारियों ने मिलकर बनाया था लेकिन एक साल के भीतर इसकी अहमियत इंटरनेट की दुनिया की बेताज बादशाह गूगल को समझ आ गई। गूगल ने 2006 के आखिरी दिनों में इसे 1.65 अरब अमेरिकी डॉलर में खरीद लिया। गूगल की तमाम महात्वाकांक्षाओं के बीच यूट्यूब को लेकर भी एक महात्वाकांक्षा है। इसी कड़ी में साइट अब कुछ प्रमुख यूट्यूब चैनल को देखने का शुल्क वसूलने की योजना बना रही है। लेकिन निसंदेह इस महात्वाकांक्षा के बीच आम लोगों को इंटरनेट की दुनिया के कई जुदा आयामों से परिचित होने का मौका मिला है। यूट्यूब पर लाखों किस्म के वीडियों हैं, जिनके अपने दर्शक हैं। हाल में हुए एक सर्वे के मुताबिक यूट्यूब समाचार पाने का प्रमुख माध्यम बनती जा रही है। यूट्यूब के कई वीडियो की न्यूज वैल्यू अहम साबित हुई है। ईरान में नेदा आगा ही हत्या से लेकर मिस्र के आंदोलन के दौरान तैयार कई वीडियो इसकी तस्दीक करते हैं। लेकिन यूट्यूब ने अहम शुरुआत की यूट्यूब चैनलों के साथ साझेदारी कर। आज कोई भी व्यक्ति या संस्था, जो वीडियो तैयार करती है, वो यूट्यूब के साथ करार कर सकती है, जिसके बाद दर्शकों की संख्या के आधार पर उसे राजस्व की प्राप्ति होती है। यूट्यूब के साथ जुड़े विवाद भी कम नहीं है। कॉपीराइट सामग्री से लेकर विवादास्पद वीडियो का झंझट साइट के साथ हमेशा से रहा है, लेकिन इसकी उपयोगिता सब पर भारी है। हां, सवाल अब भविष्य के यूट्यूब का है। आखिर यूट्यूब सिर्फ वीडियो का भंडारण करता रहेगा या इसके मार्फत वर्चुअल दुनिया में किसी और नयी क्रांति का आगाज़ होगा। इतना तय है कि फिल्मों के थिएटर के साथ यूट्यूब पर रिलीज होने, बड़े खेल आयोजनों-प्रेस कॉन्फ्रेंस से लेकर अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के यूट्यूब पर लाइव टेलीकास्ट होने और यूट्यूब के आसरे अलग अलग विषयों के वर्चुअल क्लासरुम लगने जैसी घटनाएं अब सामान्य होंगी। यूट्यूब पर क्षेत्रीय भाषाओं के कंटेंट दिखने की शुरुआत हो चुकी है, जो भविष्य में खूब दिखायी देगा। इसके अलावा स्टिंग ऑपरेशन यूट्यूब के जरिए बड़े धमाके कर सकते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि यूट्यूब ने निशुल्क वीडियो भंडारण की सुविधा देकर भी आम लोगों को बहुत बड़ी सहूलियत दी है। लेकिन, आम लोगों को यूट्यूब की गलियों से निकलते नए रास्तों को पढ़ना सीखना होगा। इन नयी राहों पर आर्थिक संभावनाओं से लेकर पहचान बनाने की संभावनाओं तक बहुत कुछ शामिल है। हां, ग्रामीण आबादी अभी इंटरनेट की पहुंच में नहीं है, लिहाजा उसे इस महत्वपूर्ण माध्यम के इस्तेमाल न कर पाने से होने वाला नुकसान तय है। यूट्यूब के आठवें जन्मदिन पर आम लोगों को यूट्यूब से होने वाले निजी फायदों के बाबत सोचना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि यहां भी कॉरपोरेट जगत इस कदर हावी हो जाए कि निजी प्रयास हाशिए पर चले जाएं।

Wednesday, February 9, 2011

मिस्र में सोशल मीडिया पर लड़ी जंग के सबब

फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब और सोशल मीडिया के दूसरे औजारों की ताकत का इल्म पूरी दुनिया को है। मिस्र में प्रदर्शनकारियों ने इसकी ताकत का अहसास एक बार फिर कराया है। ईरान में 2009 में आंदोलनकारियों ने ट्विटर और यूट्यूब का इस्तेमाल कर सत्ताधीशों की चूलें हिला दी थीं और यही कहानी मिस्र में दोहरायी गई। मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के खिलाफ आंदोलनकारियों का गुस्सा इंटरनेट पर बहते हुए भौगोलिक सीमाएं लांघने लगा तो सरकार ने इंटरनेट पर ही प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि, 30 साल से सत्ता संभाल रहे होस्नी मुबारक के खिलाफ लोगों के दिलों में सुलग रही चिंगारी सोशल मीडिया के जरिए पहले ही एक भयंकर आग के रुप में तब्दील हो चुकी थी।

ट्यूनीशिया में तानाशाह जाइन अल आबीदीन बेन अली की सरकार के खिलाफ जनमत तैयार करने में सोशल मीडिया के औजार पहले ही बड़ी भूमिका निभा चुके थे। विकीलीक्स ने सरकार की करतूतों का खुलासा किया तो फेसबुक,ट्विटर और यूट्यूब ने लोगों को आंदोलन का हिस्सा बना डाला। उन्हें एकजुट किया। ट्यूनीशिया की आग मिस्र में कब पहुंच गई, ये होस्नी मुबारक को ठीक से पता भी नहीं चल पाया। यहां भी लोग सोशल साइट्स के जरिए आपस में एक जुड़ते चले गए। आबीदीन बेन अली ने कई साइटों पर रोक लगाई थी, लेकिन घबराए मुबारक ने तो देश में इंटरनेट पर ही पूर्ण पाबंदी लगा डाली। 2007 में म्यांमार की सरकार ने इंटरनेट पर पूरी तरह पाबंदी लगायी थी और मिस्र में इंटरनेट पर रोक इतिहास में दूसरा मौका है।

लेकिन, सवाल सिर्फ राजनीतिक विद्रोह के बीच सोशल मीडिया के इस्तेमाल का नहीं है। सवाल है निरंकुश शासन के दमनकारी हथकंडों के बीच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का। अपनी बात न केवल कहने बल्कि दुनिया तक पहुंचाने का। खास बात है कि मिस्र में इंटरनेट पर रोक के कदम ने वर्चुअल दुनिया में घटती क्रांति को नयी दिशा दे डाली। दरअसल, गूगल और ट्विटर ने लोगों को मौखिक ट्वीट की सुविधा देकर इस क्रांति में एक नया अध्याय जोड़ दिया। गूगल ने ट्विटर से समझौता किया और मिस्र के लोगों की आवाज़ दुनिया तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया। मिस्र में मोबाइल से एसएमएस करने पर भी रोक लग चुकी थी, लिहाजा इस सेवा के लिए लोगों को तीन अंतरराष्ट्रीय नंबरों पर फोन कर अपनी बात कहनी थी। उनके संदेश ऑडियो ट्वीट की शक्ल में ट्विटर व कुछ अन्य साइट पर उपलब्ध कराए गए। महज दो-तीन दिनों में ट्विटर की इस सेवा से हजारों लोग जुड़ गए और ट्वीट करने वालों में मिस्र के अलावा कई दूसरे अरब और पश्चिमी देश के लोग शामिल हो गए। इस सेवा का बड़ा फायदा अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों को मिला, जिन्हें आम लोगों की आवाज़ में उनकी बात सुनने को मिली।

मिस्र में इंटरनेट सेवा अब बहाल हो गई हैं, लेकिन सवाल बरकरार है कि भविष्य में इंटरनेट पर पाबंदी के बीच क्या नए विकल्प हैं। दूसरी तरफ, मिस्र के विद्रोह में सोशल मीडिया की भूमिका ने सरकारों को भी डरा दिया है कि वो इनसे कैसे निपटें। चीन इस बाबत सबसे अधिक सतर्क है, जहां हजारों विश्लेषकों को सत्ता के पक्ष में सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर कमेंट करने के लिए तैयार किया गया है। कई मुल्कों में सरकारें अब फेसबुक-ट्विटर आदि पर नियमित नजर रखने लगी हैं। ‘द गार्जियन’ में प्रकाशित हाल में एक रिपोर्ट में कहा कहा कि मिस्र में आंदोलनकारियों के बीच ‘विद्रोह के दौरान व्यवहारिक सतर्कता’ को लेकर कुछ पर्चे बांटे गए और इसमें लिखा गया कि वो इन पर्चों को ई-मेल और फोटोकॉपी के जरिए आपस में बांटे, लेकिन फेसबुक का इस्तेमाल न करें क्योंकि सरकारी अधिकारी उस पर नजर रखे हैं। भविष्य में निरंकुश सरकारें सोशल मीडिया के भीतर तांकझांक बढ़ाएंगी, इसमें संदेह नहीं। लेकिन, बुलंद इरादे हर हाल में जाहिर होते हैं। तकनीकी युग में तो उन्हें दबाना नामुमकिन है। मिस्र में इसकी बानगी हमनें देख ली है।