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Wednesday, November 11, 2009

चंडीगढ़ हादसे से फिर उजागर प्रशासन का संवेदनहीन चेहरा

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पीजीआई चंडीगढ़ में मरीजों से कुशलक्षेम पूछ रहे हैं,तो अस्पताल के बाहर गेट नंबर-1 पर एक मरीज बेसुध हालत में कार में पड़ा है। मरीज के रिश्तेदार प्रधानमंत्री की सुरक्षा में लगे सुरक्षाकर्मियों से गिड़गिड़ाकर अंदर जाने की मिन्नतें मांग रहे हैं ताकि मरीज को इमरजेंसी वार्ड में पहुंचाया जा सके। सुरक्षाकर्मियों ने डंडा बरसाते हुए उन्हें गेट नंबर-2 की ओर भेज दिया। यहां उन्हें झिड़कते हुए फिर गेट नंबर-1 पर जाने को कहा गया। अस्पताल की दहलीज पर खड़े मरीज ने आखिरकार इस आने-जाने के बीच दम तोड़ दिया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने अब इस हादसे की रिपोर्ट तलब की है,लेकिन यह गंभीर वाक्या अपने आप में कई बड़े सवाल खड़े करता है।

इन सवालों पर चर्चा से पहले एक और हादसे का जिक्र। ये हादसा ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड में हुआ। यहां एक स्कूली छात्र ने खुदकुशी की कोशिश की। छात्र ने खुदकुशी की कोशिश से पहले सोशल नेटवर्किंग साइट ‘फेसबुक’ पर अपने स्टेटस मैसेज के रुप में सुसाइड नोट लिखा। उसने लिखा-“मैं अब बहुत दूर जा रहा हूं,वो करने जिसके बारे में मैं काफी वक्त से सोच रहा था। अब लोग मुझे खोजेंगे।” अमेरिका में बैठी छात्र की ऑनलाइन मित्र ने इस संदेश को पढ़ा तो दंग रह गई। उसे नहीं मालूम था कि छात्र ब्रिटेन में कहां रहता है ? इस लड़की ने अपनी मां को इस बारे में फौरन बताया। मां ने मैरीलेंड पुलिस को सूचित किया। पुलिस ने राष्ट्रपति भवन यानी व्हाइट हाउस के स्पेशल एजेंट से संपर्क साधा, और उसने एक झटके में वाशिंगटन में ब्रिटिश दूतावास के अधिकारियों से। उन्होंने ब्रिटेन के मेट्रोपॉलिटन पुलिस से संपर्क किया, और इस बीच छात्र के घर का पता लगाकर थेम्स वैली के पुलिस अधिकारी उसके घर जा पहुंचे। पुलिस अधिकारियों के पहुंचने से पहले छात्र नींद की कई गोलियां निगल चुका था। उसकी हालत बेहद खराब थी, और मुंह से खून आ रहा था। लेकिन, पुलिस अधिकारियों ने हार नहीं मानी। उन्होंने आनन-फानन में छात्र को अस्पताल पहुंचाया, जहां आखिरकार उसकी जान बच गई। इस पूरी कवायद में एटलांटिक सागर के दोनों ओर सांस रोककर काम कर रही पांच बड़ी एजेंसियों की तारीफ करनी होगी,जिन्होंने वक्त के साथ होड़ लगाते हुए छात्र की जान बचाने में कामयाबी पाई।

कर्तव्यनिष्ठा की अनूठी मिसाल पेश करने वाली इस वाक्ये को पढ़ने-सुनने के बाद चंडीगढ़ के हादसे से रुबरु होना शर्मसार कर देता है। आखिर, ऑक्सफोर्ड का छात्र किसी का क्या लगता था, जिसके लिए दो देशों की बड़ी एजेंसियों ने एक पांव पर खड़े होकर काम किया ? दूसरी तरफ, चंडीगढ़ में आंखों के सामने लाचार तड़पता मरीज भी क्यों सुरक्षाकर्मियों के दिलों में रहम की अलख नहीं जगा सका ?

सवाल सिर्फ चंडीगढ़ की घटना का नहीं है। इस तरह के हादसे लगातार सुर्खियां बनते रहे हैं, जब वीवीआईपी सुरक्षा पर आम आदमी की ‘बलि’ ली गई। 1998 में मार्टिन मैसे नाम के एक एक्जीक्यूटिव को कई पुलिसकर्मियों ने पीट पीटकर अधमरा कर दिया था,क्योंकि वो गलती से प्रधानमंत्री काफिले को तोड़ बैठा था। एनडीए शासनकाल में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के वीवीआईपी रूट में फंसने की वजह से कई छात्र इम्तिहान नहीं दे पाए थे। ऐसी घटनाओं की लंबी फेहरिस्त है।

दरअसल, सवाल संवेदनहीनता का है, जो अब अपने आप में एक मर्ज बनता जा रहा है। वीवीआईपी सुरक्षा के दौरान मरीज की मौत इस मर्ज की तरफ जोरशोर से ध्यान दिलाने को बाध्य करती है। वरना, इसी साल पटना के अस्पताल में जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल के चलते 38 मरीजों की जान चली गई, लेकिन क्या किसी के खिलाफ ठोस कार्रवाई हुई अथवा पुनरावृत्ति रोकने के लिए कोई कदम उठाया गया। पिछले साल 13 अगस्त को विश्व हिन्दू परिषद के अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन स्थानांतरित किए जाने के मसले पर किए गए राष्ट्रीय चक्का जाम के चलते एक 70 साल के बुजुर्ग ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। इस बुजुर्ग को दिल का दौरा पड़ा था। वो अंबाला में लगे ट्रैफिक जाम में फंसकर रह गया और चंडीगढ़ नहीं पहुंच पाया। लेकिन,क्या इस मामले पर किसी ने ध्यान दिया ?

रैलियों-धरने-हड़ताल और वीवीआईपी सुरक्षा आम लोगों के लिए परेशानी का सबब बनते रहे हैं, लेकिन इनके चलते मरीजों की जान जाने की घटनाएं अब न्यूनतम संवेदनशीलता की मांग करती हैं। और ये संवेदनशीलता सिर्फ चंद लोगों को नहीं बरतनी बल्कि पूरे समाज को बरतनी है। वीवीआईपी सुरक्षा के मामले में संवेदनहीनता बर्बर भी हो जाती है,क्योंकि वहां कानून के रखवालों के हाथ में ‘काम निपटाने’ का जिम्मा होता है। यानी अगर सुरक्षाकर्मियों को प्रधानमंत्री की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया है, तो किसी पंछी की भी क्या बिसात कि वो उनके सुरक्षा घेरे को तोड़ पाए !

वीवीआईपी दौरों के दौरान पूरा प्रशासन सिर्फ एक सूत्र पर काम करता है। वो यह कि दौरा सकुशल निपट जाए। इस बीच आम आदमी ‘भाड़ में जाए’ की तर्ज पर उपेक्षित दिखता है। फिर, व्यवहारिक स्तर पर तैयारियों का अभाव छोटी परेशानी को बड़ा कर देता है। मसलन प्रधानमंत्री के चंडीगढ़ पीजीआई दौरे के दौरान अगर सिर्फ इमरजेंसी वार्ड में जाने वाले मरीजों की सुविधा को थोड़ा ख्याल रखा जाता तो मुश्किल हल हो सकती थी। ऑक्सफोर्ड छात्र की जान बचाने की घटना जहां पश्चिमी एजेंसियों की संवेदनशील और चौकस कार्यप्रणाली की ओर इशारा करती है,तो वहीं चंडीगढ़ की घटना संवेदनहीन,लचर और बेहूदा सिस्टम की तरफ।

परेशानी यह है कि इन हादसों से कोई सबक नहीं लेता। वीवीआईपी रूट में अभद्रता का शिकार हुए लोगों की सैकड़ों शिकायतें मानवाधिकार आयोग में दर्ज हैं,लेकिन कुछ नहीं हुआ। एनडीए शासनकाल में लालकृष्ण आडवाणी ने वीवीआईपी के लिए एक अलग ट्रैफिक नीति बनाने की वकालत की थी, लेकिन इस दिशा में भी कुछ खास नहीं हुआ। मीडिया में भी ऐसे हादसे कभी मुहिम नहीं बन पाए। और राजनेताओं के लिए तो मानो दौरा लोकप्रिय होने की सबसे जरुरी खुराक है। फिर, आलू की फसल इफरात में होने पर जैसे आलू सड़क पर मारा-मारा डोलता है, उसी तर्ज पर एक अरब से अधिक आबादी वाले हमारे देश में लोग मारे डोलते हैं। सचाई यही है कि यहां जान की कोई कीमत नहीं है और यूरोपीय देशों एक जान बचाने में पूरी मशीनरी हमेशा एक पांव पर खड़ी रहती है। ऑक्सफोर्ड की घटना तो उनकी सक्रियता की अनूठी मिसाल भर है।

(ये लेख आज यानी 11 नवंबर को अमर उजाला के संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुआ है)

Tuesday, April 7, 2009

याद आया जनरैल से अपना छोटा सा नाता

दोपहर दो बजे किसी ने मुझसे कहा कि गृहमंत्री चिदंबरम को किसी पत्रकार ने जूता मार दिया तो अचानक मुंह से निकल पड़ा-कौन था पागल पत्रकार? लेकिन,दोपहर बाद टेलीविजन स्क्रीन पर उभार लेती तस्वीरों पर अचानक नज़रें गढ़ी तो दिल धक कर गया। ये तो जनरैल सिंह हैं !

जनरैल सिंह को कई लोग मुझसे कहीं ज्यादा जानते होंगे। लेकिन,जनरैल से मेरा छोटा सा नाता रहा है। टीचर-स्टूडेंट का। 1994 में यूपी बोर्ड से इंटर पास करने के बाद दिल्ली आकर बीए(पास) में एडमिशन लिया तो अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र जैसे विषय पहली क्लासों में सिर के ऊपर से निकल गए। लेकिन, तब जनरैल ने घर आकर राजनीति शास्त्र की चंद क्लास लीं। जनरैल पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स हैं। उन दिनों जनरैल पब्लिक एशिया नाम के एक अखबार में थे,और अपने पुराने स्कूटर पर पहाड़गंज स्थित मोतिया खान के मेरे घर आते थे। सिर्फ मेरे चाचा से अपने संबंधों के चलते।

इन चंद क्लास और उसके बाद की चंद मुलाकातों में जनरैल की छवि हमेशा एक बेहद सुशील और हंसमुख इंसान की रही। मेरे लिए मददगार की भी। उस वक्त,जब जनरैल सिंह को अदद बढ़िया नौकरी की तलाश थी, परेशानियां थी लेकिन तब उन्होंने कभी अपना आपा नहीं खोया। अब वो दैनिक जागरण में सीनियर रिपोर्टर हैं,लेकिन अचानक ?

दरअसल,शांत जनरैल के चिदंबरम पर जूता फेंकने का दृश्य देखने के बाद अचानक सिखों की पीड़ा एक नए अर्थ में सामने आ खड़ी हो रही है। 1984 के दंगों में सिखों का जिस तरह कत्ल-ए-आम हुआ,उसके गुनाहगार आज भी खुलेआम घूम रहे हैं,और इसका दर्द विषबुझे तीर की तरह सिखों के मन में गढ़ा हुआ है।हालांकि,जनरैल की हरकत कतई सही नहीं कही जा सकती,लेकिन इसमें भी कोई दो राय नहीं कि अगर जनरैल को चिदंबरम को जूता मारना ही होता तो अगली कतार में बैठकर ऐसा आसानी से किया जा सकता था। उनका निशाना इतना खराब नहीं होगा!

लेकिन,अब जनरैल क्या करेंगे? क्या चुनाव लड़ेंगे? शिरोमणि अकाली दल ने जनरैल को दिल्ली में टिकट देने का ऐलान किया है(अगर जनरैल चाहें तो)। जनरैल सिखों के नये हीरो बन गए हैं। वेदना में जूतों के आसरे नायकों की उत्पत्ति नया फॉर्मूला है।

Thursday, April 2, 2009

चुनाव आयोग के लिए नया सिरदर्द है मोबाइल कैंपेन

ब्लॉग और सोशल नेटवर्किंग साइट्स के अलावा जिस माध्यम पर सबसे ज्यादा ध्यान दे रही हैं-वो है मोबाइल फोन। इसकी बड़ी वजह है। भारत में करीब 71 करोड़ मतदाता और करीब 38 करोड़ मोबाइल धारक हैं। और तकरीबन 36 करोड़ मोबाइल धारक वोटर हैं। दूसरी तरफ, इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या अभी महज आठ-नौ करोड़ के आसपास है। यानी मोबाइल के जरिए वोटरों को लुभाना आसान है। राजनीतिक पार्टियां और उम्मीदवार अपने अपने संसाधनों के बीच मोबाइल का इस्तेमाल करने में जुट गए हैं। सूत्रों के मुताबिक हाईटेक प्रचार में अग्रणी भारतीय जनता पार्टी डू-नॉट-कॉल रजिस्टरी से बाहर करीब 25 करोड़ मोबाइल धारकों को चुनाव के दौरान एसएमएस भेजेगी। कांग्रेस बीजेपी से भले पीछे रहे,लेकिन करीब 15 से बीस करोड़ उपभोक्ताओं तक वो भी इस माध्यम के जरिए पहुंचने की कोशिश करेगी। बाकी राजनीतिक दलों के अलावा अपने अपने स्तर पर राजनेता भी अपने संसदीय क्षेत्र के वोटरों से मोबाइल फोन के जरिए संवाद स्थापित करेंगे। कर्नाटक, दिल्ली, मुंबई में ये कवायद शुरु हो चुकी है। वोटरों को अंग्रेजी के अलावा अब हिन्दी में भी एसएमएस भेजे जा रहे हैं। उम्मीदवारों की शिक्षा,पिछला रिकॉर्ड और विभिन्न मसलों पर उनके विचार भी एसएमएस के जरिए भेजे जाने की बात कही गई है।तमिलनाडु की एसएमएस समेत अन्य मोबाइल सेवा देने वाली कंपनी एयर टू वेब राजनीतिक वॉयस मैसेज भेजने की तैयारी में है,जिसके तहत आपके क्षेत्र का उम्मीदवार अपनी आवाज में वोट मांगेगा। टेलीकॉम ऑपरेटरों को उम्मीद है कि वो इन चुनावों के दौरान करीब चार अरब एसएमएस भेजेंगे और इससे उनकी करीब 50 करोड़ रुपए की अतिरिक्त आय होगी। लोकल स्तर पर जो एसएमएस भेजे जाएंगे,उसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। जानकारों के मुताबिक एक उम्मीदवार 80 लाख से एक करोड़ एसएमएस जरुर भेजेगा क्योंकि इससे कम एसएमएस कैंपेन का कोई अर्थ नहीं है। इस कैंपेन पर 10 पैसे प्रति एसएमएस के हिसाब से उम्मीदवार आठ से दस लाख रुपए कम से कम खर्च करेंगे। दरअसल,इस नए मद में उम्मीदवार और पार्टियां कितना खर्च करेंगी,इसका कोई हिसाब-किताब ही नहीं है। हालांकि,पंजाब के चुनाव आयोग ने साफ किया है कि चुनावी आचार संहिता के मुताबिक उम्मीदवारों को एसएमएस कैंपेन पर किए खर्च का ब्योरा देना होगा,और मतदान के दो दिन पहले एसएमएस कैंपेन बंद करना होगा। हालांकि, टेलीकॉम आपरेटर इस फरमान से खुश नहीं है, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या एसएमएस पर खर्च की गई राशि का पता लगाया जा सकता है? चुनाव आयोग पहली बार इस नयी समस्या से रुबरु है,और तमाम घुड़कियों के बावजूद उसके पास इस खर्च पर लगाम का कोई सीधा रास्ता नहीं है। ऐसे में,मोबाइल कैंपेन के परवान चढ़ने का इंतजार कीजिए,और अगर आप इस कैंपेन में दिलचस्पी नहीं रखते,तो फौरन अपना मोबाइल नंबर डू-नॉट-कॉल में रजिस्टर्ड कीजिए। ताकि,शायद राजनीतिक एसएमएस के तूफान में आप थोड़ा बच पाएं।

लेफ्ट तुझे क्या हुआ ?
एक ज़माने में कम्प्यूटर की भरसक विरोधी रही लेफ्ट पार्टियां साइबर कैंपेन के दौर में धुआंधार हाईटेक हो ली हैं। न जाने क्यों,लेफ्ट को लग रहा है कि युवाओं को लुभाने का इंटरनेट सबसे उपयोगी माध्यम साबित हो सकता है। यही वजह है कि पहले सीपीएम ने खास चुनावी मकसद से 18 मार्च को वेबसाइट लांच की-वोटडॉटसीपीआईएमडॉटओआरजी। लेकिन,लेफ्ट पार्टियों की अगुआ सीपीएम को लगता है कि हर राज्य के युवा मतदाताओं को लुभाने के लिए अलग वेबसाइट होनी चाहिए। इसीलिए,केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी सीपीएम,सीपीआई,आरएसपी,केरल कांग्रेस(जोसेफ),जनता दल(लेफ्ट) आदि के उम्मीदवारों के साइबर प्रचार के लिए दो अलग वेबसाइट लॉन्च की गई हैं। एक अंग्रेजी में-एलडीएफडॉटओआरजीडॉटइन और दूसरी मलयालम में वोटफॉरएलडीएफडॉटइन। इन दोनों साइटों पर कांग्रेस और बीजेपी पर जमकर निशाना साधा गया है। कांग्रेस की यूपीए सरकार की नाकामियों को गिनाया गया है,और अपने उम्मीदवारों की तस्वीरों समेत उनके बारे में जानकारी दी गई है। लेकिन,युवा मतदाता क्या सिर्फ सूचना लेने के लिए साइट पर आएंगे। दोनों साइटों पर
'इंटरेक्टिविटी' पर खास ध्यान नहीं दिया है। ऐसे में,ये दोनों साइटें युवा मतदाताओं को कैसे लुभाएगी,ये चुनाव बाद ही पता चलेगा।

ऑनलाइन बनाओ प्रधानमंत्री !
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को इराक में जूता क्या पड़ा,इस हादसे पर ऑनलाइन गेम बन गया। फिर,टेलीविजन चैनलों ने दो दिन बताया कि बुश को अभी तक कितने जूते पड़ चुके हैं। खैर,अब बात बुश की नहीं,मनमोहन और आडवाणी की है। वैसे,दोनों नेता खुशकिस्मत हैं कि वर्चुअल दुनिया में उनकी ठुकाई पिटाई नहीं हो रही। ओलंपिक गेम्स की थीम पर यहां नेताओं का कंपटीशन जारी है। ऑनलाइन गेम्स की कुछ साइटों पर इस तरह के राजनीतिक गेम्स शुरु हो चुके हैं,जबकि कुछ जल्द ही अपने गेम लॉन्च करने वाली हैं। पॉलिटिकल ऑनलाइन गेम बनाने वाली एक कंपनी के अधिकारी का कहना है कि ये गेम्स राजनीतिक जागरुकता फैलाने और थकान से राहत देने का काम करते है।खैर,अच्छी बात ये है कि नतीजों के लिए बेचैन लोग ऐसी साइटों पर जाकर गेम खेल सकते हैं,और अच्छा खेले तो अपना प्रधानमंत्री खुद चुन सकते हैं। ऐसी ही एक साइट है-ऑनलाइनरियलगेम्सडॉटकॉम। ये गेम्स फ्री हैं। हां,गेस्ट बनकर खेलने में ज्यादा मजा नहीं आता।

एक एसएमएस :
संटी (बंटी से) - इस बार चुनावों में संघ की ही चलेगी। इंटरनेट पर तो कोई दूसरी पार्टी उसके आसपास नहीं फटक सकती।
बंटी (संटी से)- ऐसा क्यों
? संघ तो चुनाव भी नहीं लड़ती।
संटी (बंटी से)- बेटा,नहीं लडती तो क्या। आरएसएस फीड तो सिर्फ उसी के पास है।

(दैनिक भास्कर का पोल टेक स्तंभ, 2 अप्रैल को प्रकाशित)

Sunday, March 29, 2009

पवार का विवादास्पद भाषण यूट्यूब पर क्यों नहीं?

नेशलिस्ट कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने रविवार को किसी भाषण सभा में मालेगांव ब्लास्ट का मसला उठाया। उनका बयान 'न्यूज चैनल' आजतक ने दिखाया,तो मन में इच्छा हुई कि सुना जाए कि पूरा बयान क्या है। शरद पवार के इस बयान को सुनने के लिए यूट्यूब का दरवाजा खटखटाया,लेकिन रात 11.15 तक यह वीडियो उपलब्ध नहीं था। कम से कम मुझे नहीं दिखायी दिया।

दरअसल, शरद पवार का बयान हिला देने वाला है,और देखना ये है कि अब राजनीतिक हलको में इस पर क्या प्रतिक्रिया होती है। शरद पवार ने कहा उन्हें यकीं था कि मालेगांव मस्जिद ब्लास्ट में किसी मुसलमान का हाथ नहीं हो सकता क्योंकि कोई हिन्दू मंदिर में,कोई मुसलमान मस्जिद में,कोई सिख स्वर्ण मंदिर में और कोई क्रिश्चन गिरजाघर में बम ब्लास्ट करने की सोच ही नहीं सकता। पवार ने आगे कहा कि मालेगांव ब्लास्ट के आरोपी पकड़े गए तो साफ हो गया कि किसने हमले किए थे। गौरतलब है कि कर्नल पुरोहित,साध्वी प्रज्ञा समेत दस से ज्यादा लोगों को मालेगांव विस्फोट मामले में गिरफ्तार किया गया है। यानी पवार का इशारा साफ था कि मालेगांव विस्फोट में हिन्दू आतंकवादियों का हाथ है। लेकिन,पवार ने इससे आगे जाकर जो कहा-वो निश्चित तौर पर आपत्तिजनक है। पवार ने कहा कि मालेगांव ब्लास्ट में इन आरोपियों के पकड़े जाने के बाद देश में कहीं कोई बम ब्लास्ट नहीं हुआ।

अब,सवाल ये कि इस बयान का क्या मतलब है? पवार शायद अल्पसंख्यक वर्ग को रिझाने के चक्कर में कुछ ज्यादा बोल गए। लेकिन,वो भूल गए कि साध्वी प्रज्ञा को अक्टूबर में गिरफ्तार किया गया था। उसके चंद दिन के भीतर ही कर्नल पुरोहित समेत दस लोगों को गिरफ्तार किया गया,जिन्हें नासिक अदालत में पेश किया गया था। लेकिन,इन सभी की गिरफ्तारी के बाद मुंबई में 26 नवंबर को हमला हुआ। ऐसा हमला,जिसके बारे में हम कभी सोच नहीं सकते थे। ये साबित हो चुका है कि इस हमले में शामिल सभी आतंकवादी पाकिस्तानी थे। पकड़ा गया आतंकवादी का नाम तो मोहम्मद कसाब ही है। और इस हमले में 34 से ज्यादा मुस्लिम मारे गए। यानी मुसलमान आतंकवादियों ने मुसलमानों को निशाना बनाया। फिर,अगर कोई मुस्लिम आतंकवादी मुसलमानों को निशाना नहीं बना सकता तो पाकिस्तान में रोजाना बम विस्फोट होते ही नहीं।

दरअसल,अल्पसंख्यकों को रिझाने के चक्कर में आतंकवाद को धर्म के आवरण में लपेटा जा रहा है,जो घातक है। आतंकवादी कसाब हो या प्रज्ञा-कानूनन सजा मिलनी चाहिए और सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए।

खैर,बात शुरु हुई थी कि यूट्यूब पर पवार के वीडियो की गैरमौजूदगी से। आखिर,जितना अंश चैनल ने दिखाया,उससे पवार का बयान बेहद आपत्तिजनक है। काश,खुद को प्रोग्रेसिव और मॉर्डन बताने वाली पवार की एनसीपी इस भाषण को यूट्यूब पर भी फौरन डाल देती,तो मुमकिन है कि इतनी कलम घिसनी नहीं पड़ती।

कभी कभी गुस्सा आता है जी......