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Thursday, July 30, 2009

जाको राखे 'नेटीजन', रोक सके न कोय

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी को सोशल मीडिया के कुछ दिलचस्प और चर्चित किस्सों का पता होता, तो शायद वो ऐसी गलती कभी नहीं करते। उन्होंने खुद पर गढ़े गए एसएमएस-ईमेल और ब्लॉग पोस्ट पर पाबंदी लगाने के लिए “दोषियों” को 14 साल की जेल का ऐलान कर डाला। अपनी नीतियों पर जनता की आलोचना से भन्नाए राष्ट्रपति के इस फरमान का खुलासा किया गृहमंत्री रहमान मलिक ने। उनके मुताबिक, फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वो लतीफे वाले ई-मेल और एसएमएस पर नजर रखे और दोषियों को साइबर क्राइम एक्ट के तहत जेल में ठूंस दे। लेकिन, जरदारी और मलिक का यह दांव उल्टा पड़ गया है। जरदारी पर गढ़े लतीफे एसएमएस, ई-मेल, ब्लॉग और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर खूब दिख रहे हैं। राष्ट्रपति साहब अब इस बात पर खफ़ा हैं कि इतनी जबरदस्त चेतावनी के बावजूद भी ऐसा क्यों हुआ। दरअसल,ऐसा होना ही था। सोशल मीडिया के किसी भी माध्यम में कंटेंट के आने के बाद उस पर जबरदस्ती पाबंदी लगभग नामुमकिन है। ऐसे उदाहरणों की लंबी फेहरिस्त है।

अमेरिका में चंद साल पहले पायलट गैब्रिली एडलमैन और फोटोग्राफर केनेथ एडलमैन ने अपनी साइट कैलिफोर्नियाकोस्टलाइनडॉटओआरजी के लिए पूरे समुद्र तट के फोटो खींचे तो उनमें एक तस्वीर मशहूर गायिका बारबरा स्ट्रीसैंड़ की भी थी। बारबरा ने जिद की कि उनके घर का फोटो साइट से हटाया जाए। इस बात की भनक लगते ही नेट प्रेमियों के बीच इस फोटो का धुआंधार आदान-प्रदान हुआ। तमाम साइटों और ब्लॉग पर फोटो चस्पां हो गया। नतीजा,बारबरा का यह घर आज भी नेट पर देखा जा सकता है। इसी तरह,पाठकों द्वारा किसी ब्लॉग,साइट या ट्विटर की पोस्ट की रेटिंग करने वाली वेबसाइट डिगडॉटकॉम पर 2007 में एचडी-डीवीडी को तोड़ने वाला एक कोड़ जबरदस्त हिट हुआ। सिर्फ एक दिन के भीतर 3172 ब्लॉग पर इस कोड़ का ज़िक्र किया जा चुका था। फिल्म इंडस्ट्री ने डिग पर कानूनी कार्रवाई का ऐलान किया तो डिग के संस्थापक कैविन रोज़ ने फौरन मूल कोड़ हटा लिया। लेकिन,तब तक लाखों लोग इस कोड़ को न केवल जान चुके थे,बल्कि कोड़ तोड़ने का वीडियो ‘यूट्यूब’ पर भी आ चुका था। डिगडॉटकॉम सिर्फ साइट-ब्लॉग का एग्रीगेटर है,लिहाजा इसमें उसकी कोई गलती नहीं थी। लेकिन,कार्रवाई की बात ने कोड़ के प्रचार में अहम भूमिका निभायी। ज़रदारी भी इसी तरह गलती कर गए हैं-कार्रवाई की धमकी देकर। नतीजा पाकिस्तान में यार-दोस्त आपस में तो एसएमएस-ईमेल भेज ही रहे हैं, सोशल मीडिया पर इन लतीफों की भरमार हो रही है। जानकारों की मानें तो इस माध्यम में ‘नेटीजन’ के माऊस क्लिक तक पहुंचे कंटेंट को भगवान भी उनसे नहीं छीन सकता। लेकिन, जरदारी ये बात कहां जानते थे ?

चीन बोला- नामीबिया कहां ?

इंटरनेट सेंसरशिप के मामले में चीन का कोई जवाब नहीं। ज़रा ज़रा सी बात पर चीन में वेबसाइट पर पाबंदी लगना आम हो चला है। हाल में, चीन ने सर्च इंजन में नामीबिया से जुड़े की-वर्ड ही ब्लॉक कर डाले। दरअसल,एक चीनी कंपनी के नामीबिया सरकार के साथ समझौते में हुई धांधली की खबर लीक होने के बाद चीन सरकार ने यह फैसला किया। इस फैसले के बाद बीस लाख की आबादी वाला यह दक्षिणी अफीका का मुल्क इंटरनेट से लापता हो गया। नामीबिया सर्च करने पर एरर मैसेज आने लगा। इससे पहले, जून में थ्यानमैन चौक नरसंहार की 20वीं बरसी पर चौकसी बरतते हुए सरकार ने ट्विटर, हॉटमेल और फ्लिकर जैसी कई साइटों पर पाबंदी लगा दी थी। दिलचस्प यह कि सरकार पाबंदी लगाती है,लेकिन यह खबर लीक जरुर होती है कि सरकार ने किन साइटों पर और क्यों रोक लगाई है। ऐसे में,क्या सरकार अपने इरादे में कामयाब हो पाएगी ?


आंकड़ों में :

बराक ओबामा से प्रियंका चोपड़ा तक कई हस्तियां इन दिनों माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर का इस्तेमाल कर रही हैं। एक तरह से ट्विटर नया स्टेटस सिंबल बन गई है। ट्विटर के चाहने वाले दुनिया भर में किस तेजी से बढ़ रहे हैं, इसका अंदाजा नील्सन कंपनी की रिसर्च के नतीजों से लगाया जा सकता है। इसके मुताबिक, साल 2006 में बनी इस कंपनी की साल 2008 में विकास दर 1382 फीसदी रही है। 2009 फरवरी में इसे सबसे लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म घोषित किया गया।


चलते-चलते :

जरदारी पर बने हज़ारों एसएमएस में से कुछ

1-“जरदारी और मुशर्ऱफ़ ”

हकीकत थी पर / ख्वाब निकला /दूर था पर पास निकला / मैं इस बात को क्या कहूं /ये ज़रदारी तो / मुशर्ऱफ़ का भी बाप निकला

2-“अपहरण”

आतंकवादियों ने जरदारी का अपहरण कर लिया। उन्होंने पाकिस्तान सरकार से बदले में 5 करोड़ डॉलर की मांग की है। सरकार ने लोगों से अपील की है कि वो अपने प्यारे राष्ट्रपति को छुड़ाने के लिए जो कुछ दे सकते हैं, दें।

मैंने पांच लीटर पेट्रोल दान दिया है।

(दैनिक भास्कर, दिल्ली में प्रकाशित स्थायी स्तंभ-ब्लॉग उ(वॉच)

Thursday, April 2, 2009

चुनाव आयोग के लिए नया सिरदर्द है मोबाइल कैंपेन

ब्लॉग और सोशल नेटवर्किंग साइट्स के अलावा जिस माध्यम पर सबसे ज्यादा ध्यान दे रही हैं-वो है मोबाइल फोन। इसकी बड़ी वजह है। भारत में करीब 71 करोड़ मतदाता और करीब 38 करोड़ मोबाइल धारक हैं। और तकरीबन 36 करोड़ मोबाइल धारक वोटर हैं। दूसरी तरफ, इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या अभी महज आठ-नौ करोड़ के आसपास है। यानी मोबाइल के जरिए वोटरों को लुभाना आसान है। राजनीतिक पार्टियां और उम्मीदवार अपने अपने संसाधनों के बीच मोबाइल का इस्तेमाल करने में जुट गए हैं। सूत्रों के मुताबिक हाईटेक प्रचार में अग्रणी भारतीय जनता पार्टी डू-नॉट-कॉल रजिस्टरी से बाहर करीब 25 करोड़ मोबाइल धारकों को चुनाव के दौरान एसएमएस भेजेगी। कांग्रेस बीजेपी से भले पीछे रहे,लेकिन करीब 15 से बीस करोड़ उपभोक्ताओं तक वो भी इस माध्यम के जरिए पहुंचने की कोशिश करेगी। बाकी राजनीतिक दलों के अलावा अपने अपने स्तर पर राजनेता भी अपने संसदीय क्षेत्र के वोटरों से मोबाइल फोन के जरिए संवाद स्थापित करेंगे। कर्नाटक, दिल्ली, मुंबई में ये कवायद शुरु हो चुकी है। वोटरों को अंग्रेजी के अलावा अब हिन्दी में भी एसएमएस भेजे जा रहे हैं। उम्मीदवारों की शिक्षा,पिछला रिकॉर्ड और विभिन्न मसलों पर उनके विचार भी एसएमएस के जरिए भेजे जाने की बात कही गई है।तमिलनाडु की एसएमएस समेत अन्य मोबाइल सेवा देने वाली कंपनी एयर टू वेब राजनीतिक वॉयस मैसेज भेजने की तैयारी में है,जिसके तहत आपके क्षेत्र का उम्मीदवार अपनी आवाज में वोट मांगेगा। टेलीकॉम ऑपरेटरों को उम्मीद है कि वो इन चुनावों के दौरान करीब चार अरब एसएमएस भेजेंगे और इससे उनकी करीब 50 करोड़ रुपए की अतिरिक्त आय होगी। लोकल स्तर पर जो एसएमएस भेजे जाएंगे,उसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। जानकारों के मुताबिक एक उम्मीदवार 80 लाख से एक करोड़ एसएमएस जरुर भेजेगा क्योंकि इससे कम एसएमएस कैंपेन का कोई अर्थ नहीं है। इस कैंपेन पर 10 पैसे प्रति एसएमएस के हिसाब से उम्मीदवार आठ से दस लाख रुपए कम से कम खर्च करेंगे। दरअसल,इस नए मद में उम्मीदवार और पार्टियां कितना खर्च करेंगी,इसका कोई हिसाब-किताब ही नहीं है। हालांकि,पंजाब के चुनाव आयोग ने साफ किया है कि चुनावी आचार संहिता के मुताबिक उम्मीदवारों को एसएमएस कैंपेन पर किए खर्च का ब्योरा देना होगा,और मतदान के दो दिन पहले एसएमएस कैंपेन बंद करना होगा। हालांकि, टेलीकॉम आपरेटर इस फरमान से खुश नहीं है, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या एसएमएस पर खर्च की गई राशि का पता लगाया जा सकता है? चुनाव आयोग पहली बार इस नयी समस्या से रुबरु है,और तमाम घुड़कियों के बावजूद उसके पास इस खर्च पर लगाम का कोई सीधा रास्ता नहीं है। ऐसे में,मोबाइल कैंपेन के परवान चढ़ने का इंतजार कीजिए,और अगर आप इस कैंपेन में दिलचस्पी नहीं रखते,तो फौरन अपना मोबाइल नंबर डू-नॉट-कॉल में रजिस्टर्ड कीजिए। ताकि,शायद राजनीतिक एसएमएस के तूफान में आप थोड़ा बच पाएं।

लेफ्ट तुझे क्या हुआ ?
एक ज़माने में कम्प्यूटर की भरसक विरोधी रही लेफ्ट पार्टियां साइबर कैंपेन के दौर में धुआंधार हाईटेक हो ली हैं। न जाने क्यों,लेफ्ट को लग रहा है कि युवाओं को लुभाने का इंटरनेट सबसे उपयोगी माध्यम साबित हो सकता है। यही वजह है कि पहले सीपीएम ने खास चुनावी मकसद से 18 मार्च को वेबसाइट लांच की-वोटडॉटसीपीआईएमडॉटओआरजी। लेकिन,लेफ्ट पार्टियों की अगुआ सीपीएम को लगता है कि हर राज्य के युवा मतदाताओं को लुभाने के लिए अलग वेबसाइट होनी चाहिए। इसीलिए,केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी सीपीएम,सीपीआई,आरएसपी,केरल कांग्रेस(जोसेफ),जनता दल(लेफ्ट) आदि के उम्मीदवारों के साइबर प्रचार के लिए दो अलग वेबसाइट लॉन्च की गई हैं। एक अंग्रेजी में-एलडीएफडॉटओआरजीडॉटइन और दूसरी मलयालम में वोटफॉरएलडीएफडॉटइन। इन दोनों साइटों पर कांग्रेस और बीजेपी पर जमकर निशाना साधा गया है। कांग्रेस की यूपीए सरकार की नाकामियों को गिनाया गया है,और अपने उम्मीदवारों की तस्वीरों समेत उनके बारे में जानकारी दी गई है। लेकिन,युवा मतदाता क्या सिर्फ सूचना लेने के लिए साइट पर आएंगे। दोनों साइटों पर
'इंटरेक्टिविटी' पर खास ध्यान नहीं दिया है। ऐसे में,ये दोनों साइटें युवा मतदाताओं को कैसे लुभाएगी,ये चुनाव बाद ही पता चलेगा।

ऑनलाइन बनाओ प्रधानमंत्री !
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को इराक में जूता क्या पड़ा,इस हादसे पर ऑनलाइन गेम बन गया। फिर,टेलीविजन चैनलों ने दो दिन बताया कि बुश को अभी तक कितने जूते पड़ चुके हैं। खैर,अब बात बुश की नहीं,मनमोहन और आडवाणी की है। वैसे,दोनों नेता खुशकिस्मत हैं कि वर्चुअल दुनिया में उनकी ठुकाई पिटाई नहीं हो रही। ओलंपिक गेम्स की थीम पर यहां नेताओं का कंपटीशन जारी है। ऑनलाइन गेम्स की कुछ साइटों पर इस तरह के राजनीतिक गेम्स शुरु हो चुके हैं,जबकि कुछ जल्द ही अपने गेम लॉन्च करने वाली हैं। पॉलिटिकल ऑनलाइन गेम बनाने वाली एक कंपनी के अधिकारी का कहना है कि ये गेम्स राजनीतिक जागरुकता फैलाने और थकान से राहत देने का काम करते है।खैर,अच्छी बात ये है कि नतीजों के लिए बेचैन लोग ऐसी साइटों पर जाकर गेम खेल सकते हैं,और अच्छा खेले तो अपना प्रधानमंत्री खुद चुन सकते हैं। ऐसी ही एक साइट है-ऑनलाइनरियलगेम्सडॉटकॉम। ये गेम्स फ्री हैं। हां,गेस्ट बनकर खेलने में ज्यादा मजा नहीं आता।

एक एसएमएस :
संटी (बंटी से) - इस बार चुनावों में संघ की ही चलेगी। इंटरनेट पर तो कोई दूसरी पार्टी उसके आसपास नहीं फटक सकती।
बंटी (संटी से)- ऐसा क्यों
? संघ तो चुनाव भी नहीं लड़ती।
संटी (बंटी से)- बेटा,नहीं लडती तो क्या। आरएसएस फीड तो सिर्फ उसी के पास है।

(दैनिक भास्कर का पोल टेक स्तंभ, 2 अप्रैल को प्रकाशित)

Thursday, March 26, 2009

इस लड़ाई में जीतेगा कोई नहीं !

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाइएसआर रेड्डी ब्लॉगर बन गए हैं। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को जीताने की मुहिम के तहत पार्टी ने वोटकॉन्गडॉटकॉम साइट लांच की है। इस साइट पर मुख्यमंत्री का ब्लॉग भी है। ब्लॉग इंग्लिश में है,और मुख्यमंत्री ने अभी तक जमकर तेलुगुदेशम पार्टी पर निशाना साधा है। लेकिन,सवाल ब्लॉग के कंटेंट का नहीं,लांचिंग के वक्त का है। रेड्डी साहब की पहली पोस्ट की तारीख बीस मार्च दर्ज है। आखिर,अचानक वाइएसआर को क्या लगा कि वो ब्लॉगर हो लिए? उन्होंने ब्लॉग लिखना उस वक्त शुरु किया है, जब विधानसभा चुनाव में एक महीने से भी कम वक्त रह गया है।

भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम ने भी इसी 18 मार्च को चुनाव के लिए अपनी खास वेबसाइट लांच की है-वोटसीपीआईएमडॉटओआरजी। लोकसभा चुनाव के लिए मतदान के पहले चरण में एक महीने से भी कम वक्त रह गया है,तब पार्टी को साइबर कैंपेन के जरिए युवाओं को आकर्षित करने की योजना याद आई। कांग्रेस के भी अपनी पार्टी साइट का 'लुक-फील' बदलने की चर्चा है। शाहनवाज हुसैन और मुरली मनोहर जोशी जैसे कई राजनेताओं ने भी हाल में अपनी निजी वेबसाइट और ब्लॉग लांच किए हैं।

दरअसल,सवाल यही है कि साइबर कैंपेन अचानक क्यों? पार्टियां अगर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साइबर कैंपेन से उत्साहित हैं,तो उन्हें ये भी पता होना चाहिए कि ओबामा ने अपनी साइट 2004 में रजिस्टर्ड करा ली थी। वो 2007 में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बने तो एक पखवाड़े के भीतर उनकी कैंपेन साइट 'बराकओबामाडॉटकॉम' पूरी तरह तैयार थी। लेकिन, हमारे यहां राजनेता उस वक्त साइबर कैंपेन को तरजीह दे रहे हैं,जब मतदान में चंद दिन ही बाकी रह गए हैं। जानकारों के मुताबिक,साइट अथवा ब्लॉग के प्रचार का सबसे बड़ा जरिया सर्च इंजन हैं,लेकिन सर्च इंजन में उन्हें कायदे से रजिस्टर होने में ही दो-तीन महीने लग जाते हैं। सीपीएम की नयी साइट का ही उदाहरण लें। गूगल सर्चइंजन पर की वर्ड 'सीपीएम वेबसाइट' सर्च करने पर पार्टी की नयी साइट पहले बीस नतीजों में नहीं आती।

इस जल्दबाजी में साइट या ब्लॉग पर उन जरुरी सावधानियों की तरफ भी ध्यान नहीं दिया गया,जो पाठकों को बांध सकती हैं। मसलन रेड्डी के ब्लॉग पर न पोस्ट को सब्सक्राइब करने की सुविधा नहीं है। यानी पाठक को रेड्डी साहब का ब्लॉग पढ़ना है तो हर रोज़ ब्लॉग पर आकर देखना होगा कि क्या रेड्डी साहब ने कुछ नया लिखा है। सीपीएम की साइट पर डोनेशन का लिंक है,लेकिन यहां चंदा चेक और ड्राफ्ट से मांगा जा रहा है। मुमकिन है कि ये कदम योजनागत हो लेकिन सवाल ये कि क्या वर्चुअल दुनिया के दानदाता चेक-ड्राफ्ट से भुगतान करेंगे? शाहनवाज हुसैन की साइट पर ब्लॉग का लिंक है, जो अभी तक सक्रिय नहीं हो पाया है। इस कड़ी में लालकृष्ण आडवाणी के साइबर कैंपेन को नहीं रखा जा सकता,क्योंकि इस कैंपेन का बजट करोड़ों में है। लेकिन, साइबर कैंपेन के जरिए सफलता खोज रहे बाकी नेता जल्दबाजी में उस लाभ से भी वंचित हैं,जो उन्हें मिलना चाहिए। इसका सीधा अर्थ ये है कि साइबर दुनिया में नेता लड़ाई कितनी भी लड़े-जीत किसी की नहीं होनी है।

यूट्यूब कैंपेन क्यों नहीं?वीडियो शेयरिंग साइट यूट्यूब पर 'मनमोहन सिंह' सर्च करते वक्त अचानक एक वीडियो "नाना पाटेकर-प्रधानमंत्री की फोन बातचीत" आपकी आंखों के सामने से गुजरता है,तो आप देखे बिना नहीं रह पाते। लेकिन,इस क्लिप को चलाते ही आपको समझ आता है कि ये किसी शरारती शख्स की करतूत है। फिर,जेहन में ये सवाल भी आता है कि अभी तक किसी ने(कांग्रेसियों समेत) इस क्लिप के खिलाफ शिकायत क्यों नहीं दर्ज करायी? इस क्लिप में कोई टेलीफोन बातचीत नहीं,बल्कि फर्जी मनगढंत ओछी मिमिक्री है।

इस तरह के मामलों को छोड़ दें तो यूट्यूब पर कई दिलचस्प वीडियो देखने को मिलते हैं। इनमें तेलुगु भाषा में कई राजनीतिक एनिमेशन हैं,जिनमें नरेंद्र मोदी से लेकर राहुल गांधी अपनी अपनी धुनों पर थिरकते दिखते हैं। एक वीडियो में राहुल गांधी के आईक्यू पर सवाल उठाया गया है। अब,अगर इस क्लिप के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है,तो राहुल का गुजरात को यूनाइटेड किंगडम और भारत को अमेरिका व यूनाइटेड किंगडम से बड़ा बताने की बाइट चौंकाती जरुर है।

यूट्यूब पर लालकृष्ण आडवाणी का अलग चैनल है,तो राहुल गांधी के एक प्रशसंक ने 'राहुलगांधीडॉटटीवी' खोल रखा है,जिस पर उनसे जुड़े कई वीडियो हैं। लेकिन,यूट्यूब पर राहुल गांधी,लाल कृष्ण आडवाणी,मनमोहन सिंह,मायावती,राजनाथ सिंह,देवगौड़ा सर्च करने पर एक बात साफ हो जाती है कि चुनावी मौसम में इस माध्यम का इस्तेमाल सिर्फ चलताऊ वीडियो अपलोड करने के लिए किया जा रहा है। युवाओं का पसंदीदा माध्यम यूट्यूब एक अलग किस्म के कैंपेन की मांग करता है,जहां रैलियों,उबाऊ भाषणों,प्रेस कॉन्फ्रेंस और न्यूज चैनलों के पैकेज से इतर दिलचस्प तरीके से बात कही गई हो,लेकिन फिलहाल यहां ऐसा नहीं दिखता।

छोटे खिलाड़ी भी मैदान में : वाइएसआर रेड्डी,मुरली मनोहर जोशी,लालकृष्ण आडवाणी और संजय निरुपम जैसे दिग्गज ब्लॉगरों की देखा-देखी ब्लॉगिंग के खेल में छोटे राजनीतिक खिलाड़ी भी उतर आए हैं। आरा से बीएसपी उम्मीदवार रीता सिंह ने 'रीतासिंहबीएपीडॉटब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम' शुरु किया है। बहनजी की तस्वीरों से पटे पड़े इस ब्लॉग पर रीता के भाषणों को पोस्ट में डाला गया है।मतलब रीता जी के पास खुद वक्त नहीं है लिखने का। ब्लॉग पर उनकी सभाओं और रैलियों की सूचना है ताकि वहां भारी भीड़ जुट सके। ये अलग बात है कि हर पोस्ट पर 'शून्य और एक' कमेंट बताता है कि ब्लॉग पर अभी भीड़ नहीं जुट रही।

एक एसएमएस :

संटी(बंटी से)-अगर ओबामा नहीं होते तो क्या होता?
बंटी(संटी से)-क्या होता,आडवाणी जी और उनकी पार्टी के करोड़ों रुपए फूंकने से बच जाते।
(दैनिक भास्कर में प्रकाशित पोल-टेक स्तंभ, 26 मार्च को प्रकाशित )

Friday, March 20, 2009

साइट के ऑनलाइन प्रचार से शादी के विज्ञापन तक !

इन दिनों तकरीबन हर वेबसाइट पर बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी की साइट का विज्ञापन चस्पां है। समाचार, खेल, ज्योतिष, प्रॉपर्टी जैसी तमाम अलग विषयों की साइटों से लेकर पाकिस्तानी अखबार डॉन और ब्रिटिश अखबार गार्जियन की वेबसाइट पर भी उनकी साइट का विज्ञापन दिख रहा है। बीजेपी ने इस बात का खुलासा नहीं किया है कि इस साइबर कैंपेन का बजट कितना है, लेकिन जानकारों का मानना है कि पूरे कैंपेन में 100 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए गए हैं। वजह-विज्ञापन हजारों साइटों पर दिख रहा है। गूगल के जरिए दिए गए इन विज्ञापनों को उन साइटों पर भी दिया गया है,जिनका राजनीतिक खबरों से दूर दूर तक वास्ता नहीं है। जानकारों की मानें तो इस तरह विज्ञापन देने में बीजेपी को सामान्य विज्ञापनों से तिगुना खर्च करना पड़ा होगा। लेकिन, बात सिर्फ साइबर कैंपेन के तहत साइट के धुआंधार विज्ञापनों की नहीं है। ओबामा की तर्ज पर साइबर कैंपेन करने उतरे आडवाणी जी सोशल नेटवर्किंग साइट पर खास सक्रिय नहीं है। फेसबुक और ऑर्कुट जैसी साइटों पर उनके समर्थकों की संख्या महज 1000 के आसपास है,जबकि फेसबुक पर ओबामा के समर्थकों की तादाद सात लाख से ज्यादा थी। आडवाणी जी का हिन्दी ब्लॉग बिलकुल उपेक्षित है। हिन्दी में लिखी पोस्ट पर कमेंट इक्का दुक्का हैं,और इसका अलग से कोई खास प्रचार नहीं दिखता। यू ट्यूब पर ज्यादातर वीडियो रैलियों और भाषणों से जुड़े हैं। बताया गया है कि साइट के जरिए 6000 स्वयंसेवक जुड़ चुके हैं,जबकि साइट पर बने फोरम के 7000 से ज्यादा सदस्य हैं। साइट को एक लाख पेज व्यू भी रोज़ाना मिल रहे हैं। बावजूद इसके, सवाल यही है कि देश के नौजवानों को केंद्रित कर शुरु किए गए इस साइबर कैंपेन से क्या वोट हासिल किए जा सकते हैं ? देश में कुल युवा मतदाताओं की संख्या करीब 21 करोड़ है,जबकि भारत में नेट उपयोक्ता अभी आठ करोड़ के आसपास हैं। इनमें सक्रिय नेट उपयोक्ताओं की तादाद लगभग आधी है। इनमें बड़ी तादाद 18 साल से कम उम्र के बच्चों की है। सूचना तकनीक उद्योग से जुड़े युवा अमूमन अपने गृह प्रदेश से दूर रह रहे हैं। फिर,साइबर कैंपेन भर से युवाओं का वोट अपने पक्ष में करना क्या आसान है ? जानकारों की मानें तो साइबर कैंपेन के जरिए पार्टी सिर्फ आडवाणी जी की ब्रांडिंग कर रही है। 81 साल की उम्र में भी आडवाणी ऐसे युवा नेता के रुप में अपनी ब्रांडिंग कर रहे हैं, जो उनके अंदाज,उनकी भाषा और उनकी जरुरत समझता है। साइबर कैंपेन के जरिए उनकी जबरदस्त ब्रांडिंग हो रही है,इसमें दो राय नहीं। लेकिन, युवाओं को लुभाने के चक्कर में आडवाणी जी का ये दांव कहीं उल्टा न पड़ जाए क्योंकि हर साइट पर आडवाणी जी का फोटू देखकर नयी पीढ़ी कहीं बिदक न जाएं। आखिर, अति सबकी बुरी होती है जी !

हमऊं करयें साइबर कैंपेन :

साइबर कैंपेन के दौर में समाजवादी पार्टी कैसे पीछे रहती। इंटरनेट पर पार्टी की अधिकारिक वेबसाइट के रुप में दर्ज है-समाजवादीपार्टीइंडियाडॉटकॉम। वेबसाइट पर पार्टी के नाम के नीचे लिखा है-वेलकम टू ऑफिशियल साइट ऑफ समाजवादी पार्टी। साइट पर लिखा है- “समय बदलता है, तकनीक बदलती है। समाजवादी पार्टी बदलती तकनीक के साथ कदमताल करने में यकीन करती है। “ अब,पार्टी ने साइट तो बना दी,लेकिन इस साइट के जरिए साइबर कैंपेन मुमकिन नहीं दिखता। साइट का लुक-फील बेहद साधारण है। साइट पर ब्लॉग का लिंक है, लेकिन इस साल इस ब्लॉग पर एक भी पोस्ट नहीं लिखी गई। फिर,ब्लॉग पर जाने के बाद मुख्य साइट पर जाने का कोई लिंक नहीं है। समाजवादी पार्टी की जड़े उत्तर प्रदेश में हैं,लेकिन साइट की भाषा हिन्दी नहीं अंग्रेजी है। पार्टी के समर्थक अंग्रेजी भाषी कब से हो गए-ये अपने आप में सवाल है। मज़ेदार बात ये कि इस वेबसाइट पर पार्टी शादी के उत्सुक नौजवानों का ध्यान भी रख रही है, और जमीन-जायदाद खरीदने के इच्छुक लोगों का भी। यानी वैवाहिक साइट का विज्ञापन भी यहां है और प्रॉपटी की खरीद-बिक्री से जुड़ा विज्ञापन भी। साइट पर ‘डोनेशन’ का कोई लिंक नहीं है,अलबत्ता इन विज्ञापनों से पार्टी को कितनी कमाई होगी-ये देखने वाली बात है।

चुनाव में गूगल की बल्ले बल्ले :

चुनाव में कोई जीते-कोई हारे,गूगल की बल्ले बल्ले है। एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव के दौरान बराक ओबामा ने अपनी ऑनलाइन एडवरटाइजिंग का 82 फीसदी गूगल विज्ञापनों पर खर्च किया। साल 2008 के पहले चार महीनों में ये रकम 30 लाख डॉलर से ज्यादा थी। इसी तरह, विपक्षी जॉन मैक्गेन ने भी गूगल विज्ञापन पर लाखों डॉलर खर्च किए। अब,भारत में चुनाव के दौरान गूगल को 100 करोड़ रुपए से ज्यादा आय होने की संभावना जताई जा रही है। आडवाणी के महा साइबर कैंपेन के अलावा छोटी छोटी तमाम पार्टियां अपने अपने स्तर पर प्रचार कर रही हैं। ऐसे में,गूगल को बैठे बैठाए करोड़ों रुपए की आय हो रही है। जानकारों के मुताबिक अगर साइबर कैंपेन का फंडा हिट रहा तो विधानसभा चुनावों और स्थानीय चुनावों के दौरान भी गूगल को विज्ञापन मिलना तय है।

एक एसएमएस:

आडवाणी के साइबर कैंपेन से परेशान दूसरी राजनीतिक पार्टियों का बीजेपी को एक छोटा एसएमएस ज्ञापन -“जनाब,आडवाणी जी की साइट का विज्ञापन डॉन,गार्जियन,वाशिंगटन पोस्ट के अलावा अब हमारी पार्टियों की साइट पर भी आने लगा है। राजनीतिक सद्भावना के तहत इन विज्ञापनों को कम से कम हमारी पार्टियों की साइट से तो हटवा लीजिए....। हम लोग आपके आभारी रहेंगे ”

(दैनिक भास्कर में प्रकाशित 'पोल टेक' स्तंभ)