बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी इन दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की तर्ज पर चुनावी मैदान में हैं। उनका साइबर कैंपेन धुआंधार चल ही रहा था कि उन्होंने अमेरिकी तर्ज पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को सार्वजनिक मंच पर बहस की चुनौती दे डाली।
सार्वजनिक अखाड़े में बहस की चुनौती से कांग्रेस भौचक रह गई। पार्टी प्रवक्ता आनंद शर्मा ने कहा कि भारत की संसदीय राजनीति में इस तरह की बहस की कोई जगह नहीं है, और आडवाणी लोकसभा चुनाव को भी अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव बनाना चाहते हैं।
अब,अपना न तो आडवाणी जी कोई याराना है,न कांग्रेस से कोई दुश्मनी। लेकिन,इस मुद्दे और इस मुद्दे के बाद कांग्रेसी नेताओं की तरफ से आई प्रतिक्रिया से कुछ बातें जरुर जेहन में आ गईं हैं।
पहली,सार्वजनिक मंच पर बहस में बुराई क्या है? न्यूज चैनलों से राजनीतिक समाचार खासकर ठोस राजनीतिक समाचार नदारद हो रहे हैं। सभी इसके लिए रो पीट रहे हैं। कांग्रेस सरकार भी यह दुखड़ा रो चुकी है कि न्यूज चैनल पर समाचार नहीं दिखाए जाते। ऐसे में,सार्वजनिक बहस टीआरपी बढ़ाने का हिट फॉर्मूला साबित हो सकता है। यानी सब खुश चैनल भी और नेता भी।
दूसरी,इस बहस में जो मुद्दे उठेंगे,उससे जनता को भी पता चलेगा कि वरुण गांधी से इतर भी देश में कई मसले हैं,जिन पर बात होनी चाहिए।
खैर,इस पोस्ट को लिखने का विचार मन में आया था-दिग्विजय सिंह का बयान देखकर। उन्होंने आडवाणी की बहस की चुनौती के जवाब में कहा- आडवाणी को देखिए। उन्हें लगता है कि वो भारत में ओबामा बन सकते हैं। उनकी वेबसाइट पर समर्थकों की संख्या को देखिए....जो 3100 से ज्यादा नहीं है।
अब,दिग्गी राजा का ये बयान अपने गले नहीं उतरा। दरअसल,बात आडवाणी की चुनौती या कांग्रेस के उसे स्वीकार करने की नहीं है। इस चुनौती में भी आडवाणी जी राजनीति कर रहे हैं,इसमें संदेह नहीं है। लेकिन,सवाल इस चुनौती के जवाब में दिए बचकाना बयान की है। अब,बहस की बात का आडवाणी की साइट से क्या लेना देना। और अगर लेना देना है तो दिग्विजय सिंह जी को पहले अपनी पार्टी की अधिकारिट साइट देखनी चाहिए थी।
नमूने के लिए-इंटरनेट पर ट्रैफिक मापने वाली साइट एलेक्सा के मुताबिक आडवाणी की साइट lkadvani.in की रैकिंग 9,717 के करीब है,जबकि कांग्रेस की अधिकारिक वेबसाइट aicc.org.in की रैंकिंग 1,44,000 से भी ज्यादा है। इस रैंकिंग से हिसाब लगाया जा सकता है कि किस साइट के कितने पाठक हैं।
ये अलग बात है कि आडवाणी ने साइबर कैंपेन ने करोड़ों रुपए खर्च किए हैं,जबकि कांग्रेस ने नहीं। लेकिन,ऐसा भी नहीं है कि कांग्रेस साइबर कैंपेन बिलकुल न कर रही हो। यानी दौड़ में वो पिछड़ी है।
दरअसल,बात ज़रा सी है। हमारे यहां नेताओं को हर मसले पर बोलने की आदत है। और बाइट लेने गए पत्रकारों से वो किसी भी मसले पर बात कर सकते हैं। सो दिग्विजय सिंह भी कर बैठे आडवाणी की बहस की तुलना आडवाणी की साइट से।
क्या आपको लगता है कि इन दोनों के बीच है कुछ लेना देना?
वो लोगों से दुःख मांगता था...
1 day ago
ऐसा कुछ 'महान' कर्म अभी तक किया नहीं है, जिसका विवरण दिया जाए। हाँ, औरेया जैसे छोटे क़स्बे में बचपन, आगरा में युवावस्था और दिल्ली में करियर की शुरुआत करने के दौरान इन्हीं तीन जगहों की धरातल से कई क़िस्सों ने जन्म लिया। वैसे, कहने को पत्रकार हूँ। अमर उजाला, नवभारत टाइम्स, आजतक और सहारा समय में अपने करियर के क़रीब 12 साल गुज़ारने के बाद अब टेलीविज़न के लिए कुछ कार्यक्रम और इंटरनेट पर कुछ साइट लॉन्च करने की योजना है। पांच साल पहले पहली बार ब्लॉग पोस्ट लिखी थी, लेकिन जैसा कि होता है, हर बार ब्लॉग बने और मरे... अब लगातार लिखने का इरादा है...
पियूष जी: आपने बिलकुल ठीक कहा. पूरे चुनाव हो जाते हैं तथा यह पता नहीं चलता की पार्टी का स्टैंड क्या है ! वास्तव में तो चुनाव का मतलब ही यही की बहस होनी चाएह की देश व् समाज के सामने मुद्दे क्या है? मैंने इस बार ओबामा तथा मकैन का इलेक्सन फोल्लो किया, यहाँ बहस होती है ठीक मायने में. लोगों ने सेरा पालिन को नाकारा.
ReplyDeleteयह भारत का दुर्भाग्य है की यहाँ राजनेता हमें बेवकूफ बनाते हैं. लोगों को एक साथ मिल कर तंत्र बदलना होगा.
एक समस्या ये भी है कि यदि राजी हो भी जायें तो आडवाणी से बहस करेगा कौन? पाँच साल में एक भी पत्रकार वार्ता में आमने-सामने न आने वाली सोनिया आंटी "बाराथ माथा कि जे" कहने और पल्लू समेटने में ही वक्त ज़ाया कर देंगी… यदि मनमोहन सिंह आये तो हर वाक्य से पहले उन्हें 10-जनपथ फ़ोन करके पूछना पड़ेगा कि आगे क्या कहना है? काम के बोझ से सर्वाधिक दबे हुए प्रणब मुखर्जी चाहें भी तो नहीं आ सकते, कि कहीं उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार न मान लिया जाये… यही मुश्किल कांग्रेस को रोक रही है… वरना आडवाणी से बहस की जा सकती थी… एक मुश्किल और भी आयेगी यदि भाजपा-कांग्रेस में आपस में लाइव बहस हो जाये तो तीसरे मोर्चे से भी बहस की मांग उठेगी और फ़िर उधर तो इतने सारे प्रधानमंत्री हैं कि बहस 6 महीने से पहले खत्म ही नहीं होगी…
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