Friday, February 12, 2016

थम गई 'नेट न्यूट्रिलिटी' पर बहस?

भारत में इंटरनेट तटस्थता यानी ‘नेट न्यूट्रिलिटी' के मुद्दे पर मचा घमासान फिलहाल थम गया है क्योंकि टेलीकॉम रेगुलेटरी ऑफ इंडिया यानी ट्राई ने नेट न्यूट्रिलिटी के पक्ष में अपना फैसला सुना दिया है। ट्राई ने नेट न्यूट्रैलिटी का समर्थन करते हुए कहा कि इंटरनेट कंपनियों को अलग-अलग दामों पर सेवाएं मुहैया कराने की इजाज़त नहीं होगी। कुछ कंपनियां इंटरनेट की अलग अलग सेवाओं के लिए अलग अलग दाम रखने पर अड़ी हुई थीं, लेकिन ट्राई ने अपने फैसले में कहा कि इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को काम के हिसाब से अपना शुल्क बदलने का अधिकार नहीं होगा। सिद्धांत में ‘नेट न्यूट्रिलिटी' का मतलब है कि इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाली कंपनियां इंटरनेट पर हर तरह के डाटा पैकेट को एक जैसा दर्जा देंगी। इंटरनेट सेवा देने वाली इन कंपनियों में टेलीकॉम ऑपरेटर्स भी शामिल हैं। नेट न्यूट्रिलिटी में विश्वास करने वाले मानते हैं नेट पर बहने वाला हर डाटा समान है-चाहे वो वीडियो हो, आवाज़ हो या सिर्फ पाठ्य सामग्री और कंटेंट, साइट या यूजर्स के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। भारत में अभी तक नेट न्यूट्रिलिटी ही है क्योंकि एक बार किसी कंपनी से इंटरनेट सेवा लेने के बाद उस बैंडविथ का इस्तेमाल ग्राहक अपनी सुविधा के अनुसार करता है। यानी ग्राहक चाहे तो यूट्यूब पर वीडियो देखे, स्काइप पर लोगों से बात करे, गूगल सर्च करे या मोबाइल पर व्हाट्सएप के जरिए संदेश भेजे, कंपनी को इससे लेना देना नहीं होता। इसे और सरल भाषा में समझें तो कह सकते हैं कि लोग घरों में बिजली के इस्‍तेमाल के लिए बिल देते हैं। मगर, कंपनियां यह नहीं कहती है कि टीवी चलाने पर बिजली की दर अलग होगी और फ्रिज. कंप्‍यूटर और वाशिंग मशीन चलाने पर अलग। लेकिन, 2014 में जब एयरटेल ने स्काइप और वाइबर जैसे एप्लीकेशन के इस्तेमाल के लिए ग्राहकों से अतिरिक्त शुल्क वसूलने का फैसला किया तो हंगामा मच गया। एयरटेल का तर्क था कि वॉयस कॉलिंग एंड मैसेजिंग एप्स की वजह से सीधे तौर पर उसे नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह सच भी था क्योंकि व्हाट्सएप जैसे एप्लीकेशन की लोकप्रियता ने एसएमएस को हाशिए पर डाल दिया है। नेट न्यूट्रिलिटी को लेकर बहस और तेज़ हो गई, जब ट्राई ने 118 पेज का परामर्श पत्र जारी कर दिया, जिसमें नेट नियमन से संबंधित 20 सवालों पर लोगों से राय मांगी गई थी। इनमें एक सवाल नेट न्यूट्रिलिटी से जुड़ा भी था। इस बीच, दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग इंटरनेट को गांव-गांव और हर गरीब तक पहुंचाने का ऐलान करते हुए फ्री बेसिक्स योजना लेकर बाजार में उतर पड़े। फ़ेसबुक ने इंटरनेट डॉट ओआरजी नाम से 2013 में फ्री बेसिक्स परियोजना की शुरुआत की थी। इस योजना को भारत से पहले करीब 36 देशों में लागू किया जा चुका था। फ्री बेसिक्स योजना ग्राहकों को चंद वेबसाइटों तक निःशुल्क पहुंच की सुविधा देती थी। दिसंबर में ट्राई ने नेट न्यूट्रिलिटी के मसले पर एक और परामर्श पत्र जारी किया तो फेसबुक ने "सेव फ्री बेसिक्स " नाम से अभियान छेड़ दिया और इस व्यापक प्रचार अभियान के जरिए लोगों से आग्रह किया कि वे फ्री बेसिक्स के समर्थन में ट्राई को लिखें। ट्राई ने अपने फैसले से फेसबुक के इरादे पर भी पानी फेर दिया है। लेकिन सवाल फेसबुक, एयरटेल या किसी कंपनी का नहीं है। सवाल है देश में इंटरनेट तटस्थता के मुद्दे का, और सच यही है कि ट्राई का यह फैसला कई मायनों में न केवल अहम है बल्कि ऐतिहासिक है। दरअसल, ट्राई ने अपने फैसले से बता दिया है कि नेट तटस्थता के मुद्दे पर देश क्या चाहता है, और एक लिहाज से एक टोन सैट कर दी है कि अब फ्री बेसिक्स या कुछ सेवाओं के लिए अलग शुल्क जैसे मुद्दों पर बार-बार बहस न हो। यह फैसला इसलिए भी बहुत अहम है क्योंकि ट्राई के ऊपर खासा दबाव था। फेसबुक जैसी कंपनी 400 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कैंपेन संचालित कर रही थी, और एक माहौल बनाने की कोशिश थी कि फेसबुक सामाजिक सरोकार के तहत नेट को हर गरीब तक पहुंचाना चाहती है, और नेट तटस्थता का मुद्दा खोखला है। फिर, इस प्रचार अभियान का दूसरा पक्ष यह था कि लोगों में भी यह धारणा बनने लगी थी कि अगर फ्री बेसिक्स के जरिए नेट की कुछ सुविधाएं कुछ लोगों को निशुल्क मिल सकती हैं तो इसका विरोध क्यों हो। खासकर उस स्थिति में, जब इंटरनेट अभी गांव-कस्बों तक नहीं पहुंचा है, और गांव-कस्बों में लोग इंटरनेट पर न तो ज्यादा धन खर्च करने की स्थिति में हैं, और न वे करना चाहते हैं। आम लोगों को यह समझाने वाला कोई नहीं था कि इंटरनेट क्रांति बिना नेट न्यूट्रिलिटी के मुमकिन नहीं है। कल्पना कीजिए ऑर्कुट की लोकप्रियता के दौर में फेसबुक को सेवा प्रदाता धीमी गति से डाउनलोड करवाती तो क्या फेसबुक को लोग पसंद करते? नेट न्यूट्रिलिटी न होने की स्थिति में कंपनियां मुमकिन हैं कि उस कंपनी का साथ दें, जिससे उन्हें मुनाफा हो। अभिव्यक्ति की आज़ादी को भी इसलिए पंख मिले क्योंकि नेट न्यूट्रिलिटी है, और आपके लिखे-कहे को नेट प्रदाता बिना अदालत के आदेश के प्रतिबंधित नहीं कर सकता। मुफ्त के जाल में उलझा नया ग्राहक समझ ही नहीं पाता कि इंटरनेट का आकाश कितना विस्तृत है और फ्री सेवाओं से बाहर एक बड़ी दुनिया है। ट्राई का फैसला उन छोटे नेट कार्यकर्ताओं की भी जीत है,जिन्होंने नेट न्यूट्रिलिटी को बचाने के लिए छोटी-छोटी कोशिशें कीं। ट्राई का फैसला उन देशों के लिए मिसाल है,जहां सामाजिक आर्थिक स्थिति भारत सरीखी है, और जहां इंटरनेट तटस्थता के मुद्दे पर बहस हो रही है या होनी है,क्योंकि भारत में इस मुद्दे पर जिस तरह बहस हुई और जिस तरह इसके तमाम आयामों को समझा-परखा गया-उसके बाद यह साफ हो गया कि इंटरनेट को बचाने के लिए नेट न्यूट्रिलिटी जरुरी है। निश्चित रुप से फेसबुक निराश है, और तमाम दूसरे टेलीकॉम ऑपरेटर भी। उनका तर्क है कि इससे डिजिटल इंडिया कैंपेन को धक्का लगेगा क्योंकि फ्री बेसिक्स या इस तरह की दूसरी सेवाओं के जरिए नेट की पहुंच तेजी से व्यापक होती। यह सच भी है। लेकिन ट्राई ने नेट की आजादी को गिरवी रखने के बजाय व्यापक पहुंच के मुद्दे को त्यागा है तो यह भी एक साहसिक कदम है। वैसे, सच यह भी कि नेट का विस्तार भले थोड़ा थमे लेकिन उन स्टार्टअप कंपनियों को राहत मिलेगी,जो अपने नए रचनात्मक आइडिया के साथ मैदान में उतरने को तैयार हैं। हो सकता है कि किसी स्टार्टअप के पास सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक सरीखा कोई और बेहतर आइडिया हो, जिसे वो अब आसानी से प्रचारित-प्रसारित कर सकते हैं। इंटरनेट की पहुंच की समस्या को सुलटाना सरकार का काम है। यह सरकार को देखना है कि कैसे ब्रॉडबैंड की पहुंच विस्तृत हो और कैसे जल्द से जल्द देश के हर गांव में इंटरनेट पहुंचे। दिलचस्प है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने हमेशा यही कहा कि वो नेट न्यूट्रिलिटी के पक्ष में है, लेकिन मार्क जुकरबर्ग से उनकी दो बड़ी मुलाकातों के बीच विपक्ष ने यही प्रचार किया कि सरकार नेट न्यूट्रिलिटी पर समझौता करना चाहती है। यह भी अजीब संयोग है कि जिस दिन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर नेट न्यूट्रिलिटी के मुद्दे को लेकर कई गंभीर आरोप जड़े, उसी दिन ट्राई ने अपना फैसला दे दिया। यानी एक लिहाज से सरकार ने पलटवार कर साफ कर दिया कि देश में नेट न्यूट्रिलिटी है और रहेगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज़ाद इंटरनेट के बिना इंटरनेट का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है,क्योंकि नेट न्यूट्रिलिटी की वजह से ही गरीब-रईस और शहरी-ग्रामीण के बीच कोई अंतर नहीं रह जाता। इसी वजह से तमाम नए प्रयोगों की उर्वर भूमि बनता है इंटरनेट। अमेरिका में हाल में जबरदस्त बहस के बाद तय हुआ कि नेट को जन उपयोगी सेवा का दर्जा दिया जाए और फेडरल कंम्यूनिकेशन कमिशन नेट न्यूट्रिलिटी से संबंधित कड़े नियमों के पक्ष में वोट किया। चिली में 2014 में जीरो स्कीम पर पाबंदी लगा दी गई। यूरोप में कुछ खास सेवाओं के लिए विशेष एक्सेस की सुविधा है, लेकिन अब 2013 के इस प्रस्ताव को सुधारने की दिशा में काम हो रहा है। अब भारत ने बड़ा फैसला किया है तो इसका असर दुनिया के कई दूसरे देशों की नीति पर पड़ना भी तय है। लेकिन देखना यह भी होगा कि क्या फेसबुक और तमाम दूसरी टेलीकॉम कंपनियां ट्राई के फैसले के बाद हार मान लेती हैं या फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी जाती है।

Tuesday, September 29, 2015

न्यूज़ एंकर के लिए क्रैश कोर्स ( व्यंग्य)

इन दिनों पत्रकारिता का कोर्स करने वाला हर विद्यार्थी टेलीविजन न्यूज एंकर बनना चाहता है। इन विद्यार्थियों का मानना है कि न्यूज़ एंकर ही असल पत्रकार है और बाकी लोग चैनल में घास टाइप की कोई चीज़ खोदते हैं। चूंकि, टेलीविजनी वर्ण व्यवस्था में एंकर सवर्ण है इसलिए एंकर बनना आसान नहीं है। कई जन्मों में पुण्य किए होते हैं तब एंकर बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है। फिर भी, कर्म की थ्योरी को खारिज नहीं किया जा सकता और विद्यार्थी चाहें तो कुछ खास अभ्यास करके एंकर बन सकते हैं। 80 फीसदी छात्र निम्नलिखित क्रैश कोर्स से फायदा उठा सकते हैं। पढ़ाई-लिखाई करने वाले इस कोर्स से दूर रहें। 1-एंकर बनने के लिए जरुरी है कि बंदा रोज सुबह और शाम आधा घंटा चिल्लाने का अभ्यास करें। एक अच्छे एंकर के लिए जरुरी है कि वो चिल्लाने का रियाज उसी तरह करे, जैसे गायक गायकी का रियाज़ करता है। बहुत संभव है कि ऐसा करने से आपके माता-पिता नाराज़ हों, पड़ोसी आपको देखकर नाक-मुंह सिकोड़े लेकिन आप चिल्लाने की प्रैक्टिस बदस्तूर जारी रखें। 2-रोज़ रात गर्म पानी से नमक डालकर गरारे करें। मुलेठी चबाएं। और आइसक्रीम से थोड़ा परहेज़ करें। ऐसा करने से आपका गला नहीं बैठेगा और आप नियमित तौर पर चिल्ला सकेंगे। 3-एक बेहतर एंकर के लिए जरुरी है कि वो तमाम चीखों के बीच भी अपनी बात पूरी करके दम ले। यानी कुत्ते-बिल्लियां भौं भों, म्याऊं म्याऊं करते रहें लेकिन वो आपके ध्यान को तोड़ न पाएं। आप शोरगुल में कतई न भटकें और अपनी बात पूरी करके दम लें। 4-बाजार में सुंदर दिखने की जितनी क्रीम होंगी-यदि आप एंकर बनना चाहते हैं तो वे सब आपके पास पहले से होंगी। फिर भी ध्यान रखें कि अच्छी क्वालिटी की क्रीम लगाएं क्योंकि घटिया क्वालिटी की क्रीम आपकी मुलायम त्वचा को नुकसान पहुंचा सकती है और एक एंकर इस तरह का जोखिम नहीं ले सकता। 5-एंकर बनता नहीं पैदा होता है। मतलब-आपके सामने कोई भी महान गेस्ट बैठा हो-आप उसे मूर्ख समझिए। क्योंकि अगर अक्लमंद की अक्लमंदी को आपने अपने ऊपर हावी होने दिया तो फिर पूरा कार्यक्रम चौपट हो जाएगा। 6-नए युग में एंकर के लिए हेलमेट पहनना भी जरुरी होने वाला है। तो आप एंकरिंग का अभ्यास हेलमेट पहनकर करें तो बेहतर होगा। इससे जब आप वास्तव में एंकरिंग करेंगे तो हेलमेट से दिक्कत नहीं होगी। 7-एंकर बनने का पढ़ने लिखने से कोई वास्ता नहीं है, और यदि आप समझते हैं कि मार्क्स,गांधी,लोहिया वगैरह को पढ़ना आपके लिए फायदेमंद रहेगा तो समझ लीजिए कि इससे समय की बर्बादी के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा। अच्छा होगा कि आप तमाम बाबाओं, बाबियों और हर फील्ड के स्कैंडल्स के बारे में जानें। 8-एंकर में एक एटीट्यूड होना चाहिए। अगर आप टीवी पर दिखते हैं तो फिर वो अहंकार चेहरे पर आना चाहिए। यानी एंकर बनने की कोशिश के दौरान ही ये प्रैक्टिस भी करें कि आप शाहरुख/कैटरीना की कैटेगरी के स्टार हैं, जिसे ऐरी गैरी जनता छू नहीं सकती। 9-आप भले हिन्दी चैनल का एंकर बनने की कोशिश करें लेकिन लोगों के बीच अंग्रेजी में बोलें। और इंग्लिश नहीं आती तो कम से कम दो काम जरुर करें। हर चौथे शब्द के बीच यू नो जरुर बोलें और हर पांचवे शब्द के बाद 'येSSS ' जरुर बोले... 10-दूरदर्शन के जमाने का कोई एंकर अगर आपको बता चुका है कि एंकर बनने के लिए अखबार पढ़ना जरुरी है, और आप उसका सम्मान करते हैं तो वक्त निकालकर दिन में दो चार मिनट अखबार भी पढ़ ही लीजिए। किरपा आएगी ।

Friday, September 18, 2015

पीएम की सिलिकॉन वैली की यात्रा का सबब

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी आगामी अमेरिकी यात्रा के दौरान सिलिकॉन वैली जाएंगे तो इसका मतलब क्या है? फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग, गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई, एपल के सीईओ टिम कुक और एडोब के सीईओ शांतनु नारायण समेत सूचना तकनीक के तमाम दिग्गजों से उनकी मुलाकात होनी है तो क्या ये सिर्फ एक राष्ट्र प्रमुख की विदेशी निवेश की चाहत लिए कुछ तकनीकी कंपनियों के दिग्गजों से मुलाकात भर होगी या इस मुलाकात के बाद भारत में सूचना तकनीक की दुनिया को नयी दिशा मिलेगी ? दरअसल, सवाल कई है क्योंकि नरेंद्र मोदी खुद सोशल मीडिया के माहिर खिलाड़ी हैं, नयी तकनीक का महत्व समझते हैं और 'डिजिटल इंडिया' के ख्वाब को साकार करना चाहते हैं। नरेंद्र मोदी की यात्रा से पहले अमेरिकी शिक्षाविदों ने उनके खिलाफ सूचना तकनीकी कंपनियों को खत लिखकर विरोध भी जताया और अब इस विरोध को लेकर मोदी समर्थक और विरोधी आपस में भिड़े हुए हैं। दरअसल, मोदी के डिजिटल इंडिया अभियान पर सवाल उठाते हुए अमेरिका के कुछ शिक्षाविदो सिलिकन वैली की प्रमुख कंपनियों को खत लिखकर कहा था कि डिजिटल इंडिया निजता का हनन है। खत में प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों को भारत सरकार के साथ काम करने के खतरों के प्रति आगाह करते हुए कहा गया था कि मोदी सरकार ने सांस्कृतिक एवं शैक्षिक संस्थानों की स्वायत्तता के अलावा नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के प्रति अपना असम्मान दिखाया है। यह खत सामने आया तो मोदी समर्थकों ने शिक्षाविदो को कठघरे में खड़ा करते हुए सवाल किया कि सबसे ज्यादा निजता का उल्लंघन तो अमेरिका में ही होता है, जहां प्रिज्म जैसा प्रोजेक्ट बाकायदा सरकार के नेतृत्व में चला। इसके अलावा विरोधी अब मोदी का विरोध नहीं बल्कि राष्ट्र विरोधी बातें कर रहे हैं, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इस विरोध ने यह भी जता दिया कि मोदी की अमेरिकी यात्रा के दौरान सोशल मीडिया पर एक बहस बदस्तूर जारी रहेगी। लेकिन मुद्दा बेमानी बहस का नहीं है क्योंकि मोदी का अमेरिका जाना भी तय है और सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों से मिलना भी क्योंकि वे मोदी के लिए पलक पांवड़े बिछाए बैठे हैं। फेसबुक मुख्यालय में तो नरेंद्र मोदी मार्क जुकरबर्ग के साथ उपयोक्ताओं के सवाल-जवाब सत्र में भी हिस्सा लेंगे। दरअसल, नरेंद्र मोदी की सिलिकॉन वैली यात्रा को इस आधार पर नापा जाना चाहिए कि मोदी वहां से क्या लाते हैं? क्योंकि फेसबुक, ट्विटर, गूगल और एपल जैसी तमाम कंपनियों के लिए तो भारत सबसे बड़े बाजारों में एक है, और इन कंपनियों की भावी सफलता अब इस बात पर ही निर्भर है कि उन्हें भारत में कितनी जगह मिलती है। फेसबुक के भारत में फिलहाल 14 करोड़ यूजर्स हैं, और अगले दस साल में फेसबुक की योजना इन्हें 100 करोड़ तक पहुंचाने की है। गूगल स्ट्रीट व्यू कारों का संचालन भारत में करना चाहता है। इसके लिए बाकायदा सरकार के पास आवेदन किया गया है और मोदी संभवत: खुद गूगल मुख्यालय में इस बात की घोषणा करना चाहते हैं कि गूगल स्ट्रीट व्यू कारों के संचालन को भारत में मंजूरी दी जाती है क्योंकि 14 सितंबर को मोदी ने गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय को खत लिखकर गूगल के आवेदन का स्टेटस पूछा। और दोनों से महज तीन दिनों के अंदर जवाब देने को कहा गया। बावजूद इसके कि गूगल की स्ट्रीट व्यू कारों को लेकर कई देशों में आपत्ति जताई जा चुकी है और संवेदनशील ठिकानों की तस्वीरें लेने को लेकर स्ट्रीट व्यू कार कठघरे में खड़ी की गई, मोदी स्ट्रीट व्यू कारों को लेकर उत्सुक हैं तो वजह यही है कि गूगल को एक तोहफा दिया जा सके। हालांकि, इस बारे में सरकार का आखिरी रुख साफ नहीं है लेकिन माना जा रहा है कि गूगल को भारत सरकार की तरफ से तोहफा मिल सकता है। सिलिकॉन वैली की सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियां भारत में कितना निवेश करती हैं-ये आने वाले दिनों में पता चलेगा क्योंकि मोदी की नजर उस निवेश पर भी होगी। लेकिन बड़ा सवाल निवेश का नहीं तकनीक का है। आखिर सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियां भारत को ऐसी कौन सी तकनीक देती हैं या ऐसे कौन से एप्लीकेशन बनाने में भारतीय कंपनियों को मदद करती हैं,जिनसे आम भारतीयों को लाभ हो। सूचना तकनीक के दिग्गजों के बीच खड़े मोदी से यह सवाल तो किया ही जा सकता है कि आखिर ऐसी क्या वजह रही कि दुनिया की नामी कंपनियों के सीईओ भारतीय हैं और वहां काम करने वाला बड़ा वर्ग भारतीयों का है पर भारत कभी गूगल-फेसबुक या एपल जैसी कंपनी नहीं बना सका। बीते दो दशकों से भारत सॉफ्टवेयर निर्यात के जरिए सूचना तकनीक क्षेत्र को सींच रहा है और आज भी मूलत: वही हाल है। सिलिकॉन वैली यात्रा से मोदी के डिजिटल इंडिया कैंपेन को कितना फायदा होता है-ये भी बड़ा सवाल है। क्योंकि अभी डिजिटल इंडिया कैंपेन की सफलता में अमेरिकी कंपनियों की भूमिका कम दिख रही है। वजह ये कि डिजिटल इंडिया की सफलता भारत में मौजूद बुनियादी ढांचे से जुड़ी है। सरकार ने डिजिटल इंडिया को लेकर जो योजना बनाई है, सवाल उसके क्रियान्वयन की तैयारी का है? ब्रॉडबैंड हाइवे के मामले में सबसे बड़ी बाधा है कि नेशनल ऑप्टिक फ़ाइबर नेटवर्क का प्रोग्राम, जो करीब चार साल पीछे चल रहा है। क्या अचानक तार बिछाने की गति तेज की जा सकती है और ये सवाल इसलिए भी इस संबंध में यूपीए सरकार भी मानती थी कि फाइबर ऑप्टिक्ल्स तेजी से बिछाने चाहिए। सरकार का दूसरा लक्ष्य है सबके पास फोन की उपलब्धता। लेकिन, जिस देश में गरीबी की परिभाषा 28 रुपए और 33 रुपए में उलझी हो तो वहां क्या ये संभव है। सरकार हर किसी के लिए इंटरनेट चाहती है तो यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन पीसीओ की तर्ज पर इंटरनेट एक्सेस प्वाइंट का खांका तो बहुत साल से तैयार है, जिस पर अभी तक अमल नहीं हो पाया। राष्ट्रीय डिजिटल साक्षरता मिशन अपने पहले चरण में अपने लक्ष्य से खासा पीछे चल रहा है। सरकारी दफ्तरों को डिजिटल बनाने और सेवाओं को नेट से जोड़ने के मामला इतना आसान नहीं है क्योंकि काम तो लोगों को ही करना है। कई दफ्तर जो डिजिटल हो चुके हैं, वहां काम करने वाले लोग खुद को तैयार नहीं कर पा रहे हैं। यानी एक नयी डिजिटल फौज की जरुरत होगी। ई-लॉकर जैसी तमाम योजनाएं जो आम शहरी के लिए फायदेमंद है, उसका प्रचार नहीं हो पा रहा। फिर स्टार्टअप्स के लिए कारोबारी माहौल तैयार करने और उनके लिए धन की व्यवस्था करने जैसे मुद्दे भी है। यानी देश में सूचना तकनीक को गति देने के मामले में जो चुनौतियां हैं, उनसे सरकार को ही पार पाना है और इसमें फेसबुक-गूगल जैसी कंपनियां ज्यादा भूमिका नहीं निभा सकती। तो इंतज़ार कीजिए मोदी की सिलिकॉन वैली यात्रा से हासिल का।

Tuesday, September 8, 2015

कॉल ड्रॉप के फायदे ( व्यंग्य)

क्या आप कॉल ड्रॉप की समस्या से परेशान हैं? क्या आप कॉल ड्रॉप की वजह से झुंझलाए रहते हैं? क्या आपको लगता है कि कॉल ड्रॉप की वजह से आपकी ज़िंदगी नरक हो गई है? यदि हां, तो यह व्यंग्य आपके लिए है,क्योंकि समस्या पीड़ितों के लिए यह व्यंग्य नहीं गंभीर आलेख है। या कहें ऐसा बंगाली दवाखाना है, जो खुद आपके पास चलकर आया है। दरअसल, कॉल ड्रॉप यानी मोबाइल पर बात करते करते कट जाने की समस्या उतनी बुरी नहीं जितनी आपको लग रही है। सच तो यह है कि कंपनियां कॉल ड्रॉप कर करके ग्राहकों को सुविधा दे रही हैं। कॉल ड्रॉप के रुप में ग्राहकों को ऐसी रहमत मिली है, जिसके लाभ के बारे में वे सोच ही नहीं रहे। मसलन सुबह आपका बॉस फोन करता है तो आप क्या करते हैं? आप फोन उठाते हैं और सबसे पहले सुबह उस शख्स की आवाज़ सुनते हैं, जिसकी आवाज़ आप सिवाय उस दिन के नहीं सुनना चाहते, जब वो आपको बुलाकर इंक्रीमेंट लैटर देता है। लेकिन सुबह सुबह आपको वो फटी आवाज़ सुननी पड़ती है क्योंकि फोन उठाना आपकी मजबूरी है। जबकि फोन कब रखा जाएगा, यह तय करना बॉस का अधिकार। बॉस किसी भी बात के लिए आपको फोन करता है। मसलन-कई बॉस पहले एसएमएस करेंगे और फिर फोन करेंगे कहेंगे-"यार एक एसएमएस किया है, देख लेना।" अरे ! जब फोन ही करना तो एसएमएस क्यों किया। लेकिन, कॉल ड्रॉप की समस्या ने झटके में सर्वहारा वर्ग को साम्राज्यवादी शक्तियों के बराबर ला खड़ा किया है। अगर आपको बॉस की आवाज़ पसंद नहीं आ रही तो आप हैलो हैलो करते हुए फोन काट सकते हैं और इसका ठीकरा कॉल ड्रॉप पर फोड़ सकते हैं। चूंकि यह समस्या सर्वविद्यमान है तो आप की नीयत पर शक करना बॉस के लिए आसान नहीं होगा। बॉस की छोड़िए, कॉल ड्रॉप की सुविधा का लाभ उन अनंत आशिकों को भी मिल सकता है, जिनके पास ऐसी गर्लफ्रेंड हैं, जो फेविकोल की ब्रांड एम्बेसेडर हुए बिना उसका प्रचार कर रही हैं। मसलन-कई गर्लफ्रेंड फोन पर एक ही सवाल इतनी बार पूछती हैं कि बंदा लगभग मूर्छित होने की स्थिति में आ जाता है। कई सगाई धारक और विवाह को प्रतीक्षारत भावी दुल्हे अपनी मंगेतर के सवालों से इतना परेशान हो जाते हैं कि अगर आलस्य का गुण उनमें कूट कूटकर न भरा हो तो वे रजाई से निकलकर अपना सिर कहीं पटक आएं। आलस्य नामक गुण मंगेतर के कई सवालों को एक हजार बार सुनने के बावजूद उन्हें आत्महत्या की कोशिश से बचाए रखता है। मसलन-शादी से छह महीने पहले ही मंगेतर पूछने लगती है- हम शादी के बाद कहां रहेंगे। तुम्हारी मम्मी हमारे साथ रहेंगी या देवर जी के साथ। मैं पहले ही बता रही हूं कि मुझे खाना बनाना नहीं आता। हम हनीमून पर मॉरीशस जा रहे हैं न। तुमने स्विटजरलैंड की टिकट बुक करा ली न ! वगैरह वगैरह। मंगेतर के ऐसे सवालों के विकट दौर में कॉल ड्रॉप की समस्या वरदान साबित हो सकती है। कॉल ड्रॉप का सबसे बड़ा फायदा है कि बेईमान और अनैतिक होते हुए भी आप नैतिक और ईमानदार बने रह सकते हैं। कलयुग में यह कॉम्बो ऑफर किस्मतवालों को ही मिलता है। या कहिए कि जिस तरह दिखते सभी को हैं लेकिन प्लेन के सस्ते टिकट हर ग्राहक को नहीं मिल पाते उसी तरह अनैतिक होते हुए नैतिक दिखने का वरदान सबको नहीं मिलता। तो अब आप समझ गए होंगे कि कॉल ड्रॉप कोई समस्या नहीं बल्कि टेलीकॉम कंपनियों द्वारा ग्राहक को दी जा रही एक अदृश्य सुविधआ है। आप भी कॉल ड्रॉप सुविधा का लाभ उठाइए और जीवन का भरपूर आनंद लीजिए।

Tuesday, August 4, 2015

अश्लील साइट्स के मुद्दे पर बहस जरुरी

केंद्र सरकार के बीते शुक्रवार को करीब 857 पोर्न साइट्स पर पाबंदी का आदेश सार्वजनिक हुआ तो हंगामा मच गया। सोशल मीडिया पर सरकार के इस कदम की जमकर मुखालफत भी हुई। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में 2013 में दाखिल एक जनहित याचिका के संबंध में कार्यवाही करते हुए यह फैसला किया है। 'नैतिकता' और 'शालीनता' का हवाला देते हुए सरकार ने यह भी कहा कि यह प्रतिबंध उन साइट्स के खिलाफ है, जिन पर बच्चों से संबंधित अश्लील सामग्री उपलब्ध थी। सरकार के इस फैसले और उस पर मचे हंगामे ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मसलन क्या सरकार के फैसले का एक सिरा अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ता है? क्योंकि 8 जुलाई को ही सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट पर अश्लील साइट्स को ब्लॉक करने संबंधी मामले में सुनवाई करते हुए कहा था कि पोर्न साइट पर प्रतिबंध निजता और व्यक्तिगत आजादी के खिलाफ होगा। प्रधान न्यायाधीश एचएल दत्तू ने कहा "अगर कोई मेरी कोर्ट में आता है और कहता है कि मैं एक वयस्क हूं और आप कैसे इस बात का फैसला करेंगे कि मैं वयस्क फिल्म देखूं या नहीं। व्यक्तिगत आजादी के मौलिक अधिकार की वजह से इस पर पाबंदी नहीं लगायी जा सकती है।" हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि ये एक गंभीर मसला है। सवाल ये भी है कि क्या चंद साइट्स को ब्लॉक करने से क्या इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी रुक सकती है? क्योंकि प्रॉक्सी सर्वर के जरिए आसानी से अश्लीस साइट्स तक पहुंचा जा सकता है और आज के तकनीकी युग में प्रॉक्सी सर्वर के बारे में नयी पीढी जानती है और जो लोग नहीं जानते वे आसानी से इंटरनेट के जरिए जान सकते हैं। इसके अलावा, जब मोबाइल फोन के जरिए आसानी से पोर्न कंटेंट इधर-उधर किया जाना संभव है तो इंटरनेट पर अश्लील साइट्स पर पाबंदी का मतलब क्या है? इतना ही नहीं, भारत में अश्लील साइट्स नहीं देखने को लेकर कोई कानून नहीं है, जिसका सहारा लेकर सरकार पूरी तरह इन वेबसाइट्स पर पाबंदी लगा सके, और इसीलिए नैतिकता और शालीनता जैसे तर्कों के आसरे पाबंदी को अमली जामा पहनाया गया। पोर्नोग्राफी के विषय में एक कहावत भी है-‘पोर्नोग्राफी इज द बीस्ट, विच थ्राइव ऑन द रिप्रेशन'। यानी पॉर्नोग्राफी ऐसा राक्षस है, जिसे जितना ज्यादा दबाया जाएगा, वह उतना ही ज्यादा ताकतवर बन जाएगा। इसलिए इंटरनेट पर अश्लील साइटों के खिलाफ पाबंदी का एक पहलू ये भी है कि साइट्स पर जितनी पाबंदी लगाई जाएगी, उतनी ही संख्या में नयी वेबसाइट्स शुरु होंगी। लेकिन इसके विपरित एक सवाल यह भी है कि क्या पोर्न साइट्स पर पाबंदी जरुरी नहीं है? क्योंकि जिस तरह इंटरनेट के रथ पर सवार होकर अश्लील कंटेंट नैतिक प्रदूषण फैला रहा है। खासकर बच्चों के दिमाग को प्रभावित कर रहा है और बच्चों से संबंधित पोर्नोग्राफी के बाजार को बढ़ावा दे रहा है, उसके अपने खतरे तो हैं ही। दरअसल, अश्लील साइट्स पर पाबंदी के फैसले में कई पेंच है, जिससे इसका सकारात्मक पक्ष दब जाता है, जबकि नकारात्मक पक्ष उजागर होता है। अच्छी बात यह है कि सरकार के इस फैसले के बाद पोर्न कंटेंट को लेकर समाज में दबी बहस फिर सतह पर आ गई, क्योंकि अश्लील वेबसाइट्स के हिमायती लोगों की बड़ी संख्या है और जो बात अभी तक आंकड़ों के इर्दगिर्द कही जाती थी, अब उसे चेहरे मिल रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि समाज में वयस्कों को अश्लील सामग्री पढ़ने-देखने से रोकने का कोई आधार नहीं है। अश्लील साइट्स का अपना बाजार है, जो लगातार तेजी से बढ़ भी रहा है। पॉर्नहब नाम की एक कंपनी ने 2014 में भारत में पोर्नोग्राफी के ट्रेंड पर सर्वे करवाया था और इंटरनेट पोर्नोग्राफी के लिहाज़ से भारत दुनिया में पांचवें स्थान पर पाया गया था। इस सर्वे के मुताबिक भारत के 50 फ़ीसदी लोग अपने स्मार्टफ़ोन से ऑनलाइन पोर्नोग्राफी वेबसाइट पर जाते हैं। पॉर्न साइट देखने वाला औसत भारतीय सात पेज से ज़्यादा देखता है जो कि दुनिया के औसत से तीन गुना अधिक है। और सर्वे में ये भी पता चला कि मिजोरम, दिल्ली, मेघालय और महाराष्ट्र में पोर्नोग्राफी देखने वालों का सबसे बड़ा बाज़ार है। अमेरिकी वेबसाइट 'द डेली बीस्ट' के पोर्नहब के साथ मिलकर किए अध्ययन के मुताबिक भारत में पोर्न देखने के मामले में अब भारतीय महिलाएं भी बहुत तेजी से आगे निकल रही हैं। नए आंकड़ों के मुताबिक ऑनलाइन पोर्न देखने वाली महिलाओं की कुल संख्या में भारतीय महिलाओं की संख्या 26 फीसदी से बढ़कर 30 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई है। पिछले वर्ष यह आंकड़ा 26 फीसदी था। भारत में डिजिटल पोर्नोग्राफी का बाजार 500 करोड़ से ज्यादा का है। लेकिन मुद्दा इंटरनेट-मोबाइल पर उपलब्ध अश्लील सामग्री से बच्चों के जुड़ाव का है और इस बहस में इस मुद्दे पर ही ज्यादा चर्चा नहीं हो रही। मैक्केफी के कुछ महीने पहले किए एक सर्वे के मुताबिक दिल्ली के किशोरों में 53 फीसदी ऑनलाइन पोर्न सामग्री देखते हैं, जबकि 29 फीसदी दिन में कई बार अश्लील सामग्री देखते हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील सामग्री तक बच्चों की सहज पहुंच की चिंताजनक है। इस बाबत अब बात होनी चाहिए। दुनिया के कई देशों में बच्चों के लिए इंटरनेट को सुरक्षित बनाने की दिशा में काम हो रहा है।चीन में ‘क्लीनिंग द वेब-2014’ अभियान के तहत 5०० से ज्यादा अश्लील वेबसाइटों को बंद कर दिया गया था। जर्मनी में ऐसी साइटों को रोकने के लिए ‘किंडर सर्वर’ शुरू किया गया। लेकिन भारत में ऐसी कोई कोशिश फिलहाल नहीं हुई। यह अजीबोगरीब है कि सड़क पर गाड़ी चलाने के लिए हमें ड्राइविंग लाइसेंस लेने की आवश्यकता होती है। लेकिन इंटरनेट के सुपर हाइवे पर गाड़ी दौड़ाने के लिए किसी को किसी तरह के लाइसेंस अथवा ट्रेनिंग की कोई आवश्यकता नहीं। इंटरनेट के इस्तेमाल के बाबत लगातार हो रहे सर्वे बता रहे हैं कि घरों में बच्चे इंटरनेट किस तरह इस्तेमाल कर रहे हैं-इसका मां-बाप को अमूमन पता नहीं होता। इंटरनेट कनेक्शन देते वक्त इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर किसी तरह का कोई क्रैश कोर्स नहीं करातीं या जानकारी देतीं कि इंटरनेट पर क्या क्या सावधानियां बरती जाएं ताकि बच्चों के हाथों में सुरक्षित कंटेंट पहुंचे। अश्लील साइट्स पर पाबंदी के बीच सरकार की तरफ से एक बयान यह भी आया है कि यह पाबंदी अस्थायी है लेकिन सच यही है कि इंटरनेट पर पोर्न कंटेंट को तकनीकी रुप से रोकना लगभग असंभव है। एक विकसित समाज में कौन क्या देखेगा-यह तय करना सरकार का काम नहीं है। यह लोगों को खुद तय करना होगा। लेकिन इंटरनेट के जरिए बहती अश्लीलता बच्चों के कोमल मन को प्रदूषित न करे-इसकी जिम्मेदारी किसकी है?

Thursday, July 2, 2015

सवाल नेहरु का नहीं, हमारा है

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के विकीपीडिया प्रोफाइल को 27 जून को किसी ने बदल दिया और उन्हें मुस्लिम बता दिया। उनके पिता मोतीलाल नेहरु और उनके दादा के प्रोफाइल पेज पर भी इसी तरह छेड़खानी की गई। इतना ही नहीं, नेहरु के बारे में कुछ अन्य आपत्तिजनक बातें भी प्रोफाइल में जोड़ी गईं। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि जिस आईपी एड्रेस से यह छेड़खानी की गई, वो केंद्र सरकार को सॉफ्टवेयर देने वाली संस्था नेशनल इंफोरमेटिक्स सेंटर के दफ्तर का है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नेशनल इंफोरमेटिक्स सेंटर ने अब इस बाबत आंतरिक जांच शुरु कर दी है कि किसने यह छेड़खानी की। दुनिया के सबसे बड़े ऑनलाइन संदर्भकोश विकीपीडिया पर नेहरु के प्रोफाइल से छेड़छाड़ कोई पहला मामला नहीं है, लेकिन इस मामले में एनआईसी का नाम आन के बाद विवाद न केवल अहम हो गया है बल्कि कई सवालों के जवाब की मांग करता है। सबसे बड़ा सवाल यही कि क्या सरकार विरोधी दलों के बड़े नेताओं की वर्चुअल पहचान को धूमिल करने की कोशिश कर रही है? दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियां अपने ब्रांड या प्रोडक्ट का विकीपीडिया पेज लगातार न केवल अपडेट करती हैं बल्कि उनमें उत्पाद की खूबियां बढ़ा चढ़ाकर पेश करनी की कोशिश करती हैं। इसके लिए पेशेवर लोगों की मदद ली जाती है। इंटरनेट पर सूचना प्राप्ति का विकीपीडिया प्राथमिक और महत्वूर्ण स्रोतों में एक है तो इस चलन को कंपनियों से आगे बढ़कर कुछ सरकारों ने भी अपनाया और बड़ी शख्सियतों ने भी। बावजूद इसके सच यही है कि विकीपीडिया 'ओपन सोर्स' है, और इसमें संपादन (कुछ मामलों को छोड़कर) कोई भी कर सकता है। विकीपीडिया के बारे में कई भ्रांतियां है। सबसे पहली तो यही कि कई लोग इसे प्रामाणिक संदर्भकोश की तरह देखते हैं। जबकि विकीपीडिया में गलतियों की भरमार है। कुछ साल पहले अमेरिका के पेन स्टेट विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर मारिका डब्लू डिसटासो ने अपने अध्ययन में पाया था कि विकीपीडिया पर मौजूद हर दस में से छह लेखों में अशुद्धियां हैं। अध्ययन के दौरान किए एक सर्वे के मुताबिक जब विकीपीडिया के टॉक पेज के जरिए अशुद्धियां दुरुस्त करने की कोशिश हुई तो नतीजा बहुत उत्साहजनक नहीं रहा। 40 फीसदी लोगों को विकीपीडिया के संपादकों की तरफ से प्रतिक्रिया मिलने में एक दिन से ज्यादा का समय लगा, जबकि 12 फीसदी को एक हफ्ते से ज्यादा का वक्त लगा। खास बात यह कि 25 फीसदी शिकायतों के संदर्भ में तो कोई प्रतिक्रिया ही नहीं मिली। इस अध्ययन के मुताबिक 60 फीसदी कंपनियों के पेजों पर उनके अथवा उनसे जुड़े ग्राहकों के बारे में तथ्यात्मक रुप से गलत जानकारी है। गौरतलब है कि विकीपीडिया ने करीब तीन साल पहले स्वयं अपने अपने संदर्भ कोष के बारे में कराए एक अध्ययन में पाया था कि 13 फ़ीसदी लेखों में ग़लतियाँ हैं। साल 2012 में विकिपीडिया की विश्वसनीयता को बड़ा सवाल उस वक्त खड़ा हो गया था, जब एक काल्पनिक युद्ध से संबंधित लेख को पाँच साल बाद साइट से हटाने की बात सार्वजनिक हुई। यह लेख ‘बिकोलिम संघर्ष’ नाम के एक काल्पनिक युद्ध के बारे में था। इसमें 17वी शताब्दी में पुर्तगालियों और मराठा साम्राज्य के बीच काल्पनिक युद्ध का जिक्र था। बाद में वेबसाइट को जानकारी मिली कि ऐसा युद्ध कभी हुआ ही नहीं और लेख में शामिल जानकारियां और संदर्भ पूरी तरह काल्पनिक हैं। यह लेख जुलाई 2007 में विकिपीडिया पर डाला गया था और सिर्फ दो महीने बाद वेबसाइट के संपादकों ने इसे अच्छे लेखों की श्रेणी में डाल दिया था। उल्लेखनीय है कि विकिपीडिया पर उपलब्ध अंग्रेजी के कुल लेखों में सिर्फ एक फीसदी लेखों को इस श्रेणी में रखा गया है। विकीपीडिया पर सामग्री से छेड़छाड़ का एक मामला 2011 जुलाई में मुंबई बम धमाकों के वक्त सामने आया था, जब अजमल कसाब के जन्म तारीख को एक दिन में ही 8 से ज्यादा बार बदला गया। विकीपीडिया की विश्वसनीयता 100 फीसदी कभी नहीं रही। हां ये तमाम विषयों पर जानकारी का प्रथम स्रोत अवश्य है। दिक्कत यही है कि विकीपीडिया प्रथम स्रोत के बजाय मुख्य स्रोत की जगह लेता जा रहा है। इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि 244 साल पहले शुरु हुए सबसे प्रामाणिक संदर्भकोश ब्रिटेनिका को भी अपना प्रिंट संस्करण बंद करना पड़ा है। इसमें भी ध्यान रखने वाली बात यह है कि विकीपीडिया के पेजों को विकीपीडिया के स्वयंसेवक अपडेट करते हैं। अंग्रेजी विकीपीडिया के स्वयंसेवकों की संख्या लाखों में है, इसलिए अंग्रेजी विकीपीडिया तेजी से अपडेट होता है, जबकि हिन्दी समेत तमाम क्षेत्रीय भाषाओं के पेजों में सैकड़ों त्रुटियां कई-कई दिनों तक सुधारी नहीं जातीं। दिक्कत यह है कि अकादमिक, पत्रकारीय और अन्य महत्वपूर्ण मंचों पर भी विकीपीडिया से ली सामग्री बिना 'क्रॉस चैक' के इस्तेमाल की जा रही है। लेकिन अब सवाल विकीपीडिया की विश्वसनीयता भर का भी नहीं है। सवाल है वर्चुअल दुनिया में अपनी पहचान के विषय में पता होने और उसे बचाने का। क्या हमने कभी देखा है कि वर्चुअल दुनिया में हमारी पहचान कैसी है? बहुत मुमकिन है कि किसी अंजान ब्लॉग पर आपके बारे में ऐसी भ्रामक और गलत बातें लिखी हों-जिनके बारे में आपको पता ही नहीं हो और सर्च इंजन में आपके बारे में खोजने पर वही पेज सबसे पहले आता हो। हो सकता है कि आपके नाम से कोई टि्वटर या फेसबुक खाता संचालित हो रहा है, जिस पर आपने कभी ध्यान ही नहीं दिया हो। विकीपीडिया पर जवाहरलाल नेहरु के पेज से छेड़छाड़ ने फिर इस मुद्दे को प्रमुखता से उठा दिया है। क्योंकि सवाल सिर्फ जवाहरलाल नेहरु, महात्मा गांधी या किसी बड़े राजनेता का नहीं, हमारा भी है। सवाल हमारी 'वर्चुअल आइडेंटिटी' का भी है। नए डिजिटल समाज में हर सामाजिक व्यक्ति की वर्चुअल दुनिया में भी एक पहचान है, और यह जिम्मेदारी उसे खुद उठानी होगी कि उसकी आभासी पहचान सही सलामत और प्रामाणिक रहे। यह बड़ी चुनौती है कि क्योंकि अभी भी देश में डिजिटल साक्षरता बहुत अधिक नहीं है, और लोग वर्चुअल पहचान को लेकर ज्यादा सजग नहीं है। सच यही है कि इंटरनेट के विस्तार के साथ इस नई समस्या के बड़े खतरों से रुबरु होना हमें अभी बाकी है। (लेखक सोशल मीडिया जानकार है)

Thursday, June 4, 2015

कम नंबर लाने के भी फायदे हैं ! (व्यंग्य)

सीबीएसई बोर्ड के दसवीं-बारहवीं के नतीजे आ गए हैं। कुछ बच्चों को 100 फीसदी नंबर मिले हैं। 97-98-99 फीसदी नंबर लाने वाले तो कई हैं। ऐसा लग रहा है कि मानो नंबरों की लूट मची और बच्चों ने पैन की नोंक पर सब लूट डाले। इत्ते नंबर मिले हैं कि कई बार शक होता है कि जांचने वाले अध्यापक ने वास्तव में ठीक तरह से जांच की भी या नहीं ? एमपी बोर्ड और यूपी बोर्ड से दसवीं-बारहवीं कर चुके लोग तो नंबरों के इस खेल की जांच की मांग कर सकते हैं। यूपी-एमपी बोर्ड में दसवीं-बारहवीं में मिलाकर जितने अंक नहीं आते थे, सीबीएसई में एक बार में ही आ जाते हैं। ऐसे में नंबरों के घोटाले की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। इस देश में आज तक किसी घोटाले की जांच कायदे से निष्कर्ष पर नहीं पहुंची, लिहाजा नंबरों के घोटाले की जांच का निष्कर्ष तक पहुंचना असंभव है। लेकिन सवाल नंबरों का नहीं, उन बच्चों का है, जिनके नंबर नहीं आए। वे उदास हैं। इस कदर उदास हैं कि कुछ पटरी तक हो आए और ट्रेन को दो मिनट विलंब से आता देख अपने खुदकुशी के कार्यक्रम को स्थगित कर लौट आए। कुछ ने घर से भागने का प्रोग्राम इसलिए स्थगित कर रखा है कि बाहर गर्मी बहुत है। उन्हें सिर्फ अच्छे मौसम का इंतज़ार है। इस देश में नंबरों का बड़ा महत्व है। बैंक एकाउंट से लेकर संसद तक अंकों के आसरे सफलता का आँका जा रहा है। लेकिन बोर्ड के इम्तिहान में कम नंबर वाले इस चक्कर में न फंसें। कम नंबर का अपना महत्व है। उसके अपने लाभ हैं और उस फायदे को समझें। इससे बड़ी किरपा आएगी। कम नंबर का आर्थिक लाभ यह है कि आपको पार्टी नहीं देनी पड़ेगी। आपके मां-बाप को भी नहीं। आप सिर्फ पार्टी उड़ाएंगे, देंगे नहीं। यानी महंगाई के इस दौर में जबरदस्त बचत। कम नंबर का दूसरा लाभ यह है कि आप यह बता सकते हैं कि आप जिस बात को शिद्दत से महसूस करते हैं, उसी राह पर चलते हैं। और आप इस बात को शिद्दत से महसूस कीजिए कि अंकों का कोई मतलब नहीं है। कम नंबरों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे आप पर कोई दबाव नहीं रहता। घर के सारे सदस्य समझ जाते हैं कि आप निठल्ले हैं या आपसे कुछ नहीं होगा। और जब तक दबाव नहीं होता तो इंसान मस्ती की धुन में रहता है। इसके अलावा जब दबाव न हो और फिर बंदा छक्के जड़ दे तो झटके में खिलाड़ी महान हो जाता है।